Thursday, July 12, 2018

कैसे मना करूँ ?

कई बार आपको अखरता होगा कि क्यों मना नहीं किया? 'हाँ' करके फंस गए। आपने 'हाँ' किया या 'न', फिर उस ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते। यह आपका अपना निर्णय होता है, ये बात दूसरी है कि निर्णय लेते समय आप पर कौन सा दबाव काम कर रहा था। वैसे तो निर्णय सोच-समझकर लिए जाते हैं लेकिन कई बार भावुकता से प्रभावित हो जाते हैं, हम मना करने में संकोच कर जाते हैं और बाद में पछताते हैं। अधिकतर अनुभव बताते हैं कि मना नहीं कर पाना उनके लिए अंततः कितना दुखदायी सिद्ध हुआ! इसीलिए हमारे मन में धीरे-धीरे एक तैयारी होने लगती है कि यदि ऐसे अवसर आएँ तो क्या करना? कितना अच्छा हो कि मना किया जा सके और सामने वाले को बुरा भी न लगे?

कड़ाके की ठंड में कोई आपसे आइसक्रीम खाने का अनुरोध करे तो हमारे सामने दो विकल्प होते है, उसकी बात मान जाएँ या मना कर दें। यदि बात टालना संभव न हो, उसके नाराज़ हो जाने का डर हो तो मुस्कुराते हुए आइसक्रीम खा लीजिए और उसका दुष्परिणाम, जुकाम या गले का दर्द मोल ले लीजिए या फिर मना करके स्वयं को सुरक्षित कर लीजिए, भले वह नाराज़ हो जाए। अक्सर ऐसा होता है कि संकोच में 'हाँ' हो जाता है और बाद में पछतावा होता है कि क्यों 'हाँ' किया? जबकि होशियारी इसमें है कि यदि आपको मना करना है तो मना कर दें और वह नाराज़ भी न हो।

आप सोच रहे होंगे कि मना करना इतना आसान है क्या? यदि कह पाते तो क्यों न कह देते? आप सही सोच रहे है। मना करने से सामने वाले को दिली चोट पहुँचती है। उसे लगता है कि उसकी बात काट दी गई। यह सच है कि जिसने आपसे कोई उम्मीद की है वह आपसे 'हाँ' सुनना चाहता है, यदि उसे पहले से मालूम होता कि मना होने वाली है तो कभी न कहता। उसकी जगह खुद को रखकर देखिए तो पूरी मनस्थिति आपको समझ में आ जाएगी। ज़रा सोचिए, उसकी जगह आप होते और मना हो जाता तो आपको कैसा लगता?

मैं जब आर्थिक दुर्दशा के दौर से गुज़र रहा था तो मेरा ऐसी स्थितियों से मेरा कई बार सामना हुआ। अपने एक पुराने सामर्थ्यवान मित्र से मैंने पाँच हजार मांगे तो वह अपने आर्थिक संकट को इस कदर रूआँसा होकर बताने लगा कि मैंने उससे पूछा- 'अपने लिए तो मांगने निकला ही हूँ, तुम्हारे लिए भी मांग लूँ क्या?'

कोई भी व्यक्ति आपसे कुछ मांगता है तो आशा लेकर आपके पास आता है लेकिन आपकी नकारात्मक प्रतिक्रिया उसे आहत करती है जिसे सामने वाला बहुत गंभीरता से लेता है और अपमानित महसूस करता है। समस्याओं से कौन अछूता रहता है? संकट किस पर नहीं आते? ऐसी कठिन परिस्थितियों पर अपने करीबी, परिचित या रिश्तेदार याद आते हैं। यदि मना हो गया तो वह व्यक्ति अपने सम्बन्धों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर हो जाता है और सोचने लगता है- 'ये कैसा संबंध?'

मना करना हर व्यक्ति का विशेषाधिकार है। अपने हितों और धन-संपत्ति को सुरक्षित रखना बुद्धिमानी है और इसके लिए बहुत सफाई देने की ज़रूरत नहीं होती। ज़रूरी यह होता है कि आपके मना करने के तरीके में माधुर्य हो। समझदारी से किया गया इंकार इस बात को दर्शाता है कि आप दूसरों की ज़रूरत और स्वयं के प्रति संवेदना का भाव रखते हैं। कई ऐसे लोग होते हैं जिन्हें मना करना मुश्किल होता है; जैसे पति या पत्नी, बच्चे, रिश्तेदार, मित्र-उनकी बीबियाँ, पड़ोसी, अफसर, सह-व्यवसायी, धार्मिक-सामाजिक कार्यकर्ता। उनकी ज़रूरत को समझने की ज़िम्मेदारी वाली चिड़िया आपके पाले में होती है, देखना यह होता है वापसी 'शॉट' आप कैसा भेजते हैं?
ऐसे निर्णय लेने से बचिए जो आपको बाद में दुख देने वाले हैं। किसी नाज़ुक मौके पर इंकार करने का निर्णय आपको किसी भावी हानि से बचा सकता है और आपके व्यक्तित्व तथा कृतित्व में निखार ला सकता है। इससे आत्मशक्ति बढ़ती है, आत्मविश्वास मज़बूत होता है जो आपकी 'सेल्फ इमेज़' को बढ़ाने में सहायक होता है।
मना करने में हड़बड़ी न करें, थोड़ा समय लेना अच्छी तरकीब है। कुछ अच्छे वाक्य हैं, इनका उपयोग कीजिए जैसे, 'यह तो शानदार पेशकश है लेकिन इस समय मैं इसका लाभ उठा पाने की स्थिति में नहीं हूँ' या, 'यह अच्छा विचार है लेकिन मुझे लगता है कि इस समय इसे टालना होगा।' आप इस प्रकार अपने इंकार को एक सकारात्मक मोड़ दे सकते हैं और दूसरे की भावना को ठेस पहुँचाने से बच सकते हैं। असावधानी से किए गए इंकार से अप्रिय स्थितियों बन जाती हैं। ऐसे मौके कम आते हैं जब तुरंत 'हाँ' या 'न' में जवाब देना होता है। यूं जवाब दीजिए, 'मुझे इस बारे में सोचने का समय दीजिए' या, 'मुझे हाँ कहना अच्छा लगेगा लेकिन मैं तुरंत ऐसा नहीं कह पाऊंगा' या, 'मुझे थोड़ा समझने का समय दीजिए ताकि मैं यह तय कर सकूँ कि मैं कुछ कर सकता हूँ या नहीं।' इस तरीके से यह संदेश जाता है कि आप उसकी बात को गंभीरता से ले रहे हैं और उस पर विचार भी कर रहे हैं।
बातचीत के दौरान हमारे समक्ष यह चुनौती रहती है की कैसे सामने वाले को अपनी बोतल में उतारा जाए? मान लीजिए, आपकी योजना सुविचारित है और आप स्वयं में स्पष्ट हैं फिर भी कोई निश्चित 'माइंड सेट' बनाकर न चलें क्योंकि आपसे मिलने वाला हर व्यक्ति अपने किस्म का अनोखा है, सबको एक ही लाठी से नहीं हाँका जा सकता। यदि आप दूसरे को अपनी पटरी पर लाना चाहते हैं तो आक्रामक न बनें, Handle with care को सदैव ध्यान में रखें। किसी भी बातचीत को सकारात्मक मोड़ देने के लिए शब्दों का चुनाव महत्वपूर्ण होता है। सामने वाले को अपनी बात जबरन मनवाने का प्रयास घातक सिद्ध हो सकता है इसलिए उसके विचारों को बदलने की कोशिश न करें बल्कि अपनी विचारधारा को उसके दिमाग में धीरे-धीरे जगह बनाने दें। बेंजामिन फ्रेंकलिन को उनके मित्र ने सुझाया था- 'मेरे दोस्त, कभी भी खुद को होशियार सिद्ध करने की कोशिश मत करना, ये मनुष्य की महानतम मूर्खता होती है। बेहतर है तुम अपने विचार और व्यवहार से सामने वाले को प्रभावित करो, ऐसे अवसर आने दो जब वह तुमको बुद्धिमान मान ले।'

ध्यान रखें, किसी को दुखी न करें। प्रशंसा और मधुर संभाषण से तनाव कम होता है, कठिन स्थितियाँ सामान्य हो जाती हैं और आपसी समझदारी में वृद्धि होती है। यदि आपकी बात में दम है तो सहमति के बिन्दु अपने-आप उभरने लगेंगे। यह ज़रूरी नहीं है कि अपनी बात किसी भी तरह मनवाई जाए लेकिन यह ज़रूरी है कि अपने व्यवहार और बातों से किसी को चोट न पहुंचे। जब आप किसी पर अपनी बात मानने का दबाव डालते हैं तो वह आपके विरोध में चला जाता है, तब आपके प्रयासों का क्या हश्र होगा?
एक व्यक्ति को किसी ने बताया कि पालतू कुत्ते को 'कॉड लीवर आयल' देना लाभदायक होता है इसलिए उसने अपने डाबरमेन कुत्ते को पिलाने का निर्णय लिया। उसने अपने कुत्ते का चेहरा अपने दोनों घुटनों के बीच फंसाया, ताकत लगाकर उसका जबड़ा खोला और जबरन शीशी में भरा हुआ तेल उसके मुंह घुसेड़ दिया। कुत्ते ने विरोध किया, भागने की कोशिश की और अचानक उसकी पकड़ से छूट कर दूर खड़ा हो गया। मालिक के हाथ से तेल की शीशी फिसल गई और तेल पूरे फर्श पर बिखर गया। कुत्ते के मालिक के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उसने देखा कि कुत्ते ने फर्श पर बिखरा तेल खुशी-खुशी चाट लिया और शीशी को भी चाटने लगा, तब उसे समझ में आया कि उसका कुत्ता तेल पीने का विरोध नहीं कर रहा था बल्कि वह तेल पिलाए जाने के तरीके से नाराज़ था।
बात सिर्फ पैसे के लेन-देन की नहीं है, अनेक संगठनों और प्रकल्पों से जुड़ने के प्रस्ताव भी आते रहते है। इसके लिए आपकी कार्यशक्ति, समय और धन की आवश्यकता होती है।
एक निहायत खूबसूरत और मजबूत इरादों वाली महिला किसी संस्था के लिए चन्दा उगाहने के लिए मेरे पास आई और मुझ पर सीधा हमला किया- 'आपके नाम से 1000/- की रसीद काट रही हूँ।' उनका लहजा आदेशात्मक लेकिन अपनेपन से सराबोर था। उनसे मेरे पारिवारिक संबंध थे, बात टालना मुश्किल था लेकिन मैं अपने एक हज़ार रुपयों की बलि देने को तैयार न था। इस बीच उन्होंने रसीद बनाने का काम जारी रखा और मेरा दिमाग संकट से उबरने के उपाय खोजने लगा। मैंने उनसे कहा- 'मैं आपको सहयोग करना चाहता हूँ क्योंकि आपने मुझे इस योग्य समझा लेकिन दूँगा अपनी खुशी से।'
'ठीक है, खुशी से दे दीजिए।' वे बोली। मैंने पर्स से सौ का एक नोट निकाला और उनको दे दिया। वे चौंकी- 'ये क्या?'
'यही मेरी खुशी की सीमा है, इसके आगे दुख शुरू हो जाता है।'
'क्या मतलब?'
'मेरी पत्नी ने मेरी एक सौ रुपए डोनेशन देने की लिमिट बनाई है, आप तो उन्हें जानती हो। मैं इतना ही दे सकता हूँ, इससे अधिक के लिए आपको उनसे जाकर मिलना होगा।'
'सच में?'
'जी।' मैंने लाचारी वाला भाव व्यक्त किया। उन्होंने मुझे दया की दृष्टि से देखा और वे केवल सौ रुपए में मान गई, इस प्रकार मेरे नौ सौ रुपए बच गए।
इस घटना से उपजा ज्ञान:
(1) किसी अनायास आक्रमण से भयभीत न हों।
(2) किसी की सुंदरता और व्यक्तित्व को खुद पर हावी न होने दें।
(3) मन को शांत रखें और संकट से बचने के उपाय खोजें।
(4) सामने वाले के साथ सज्जनता से पेश आएँ और उसकी बात को गौर से सुनें और समझने का अभिनय करें।
(5) अपनी प्रतिष्ठा के 'ग्राफ' को नीचे रखने से बचत में वृद्धि होती है।
(6) अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिए झूठ का सहारा लेने में कोई हर्ज़ नहीं है।
यदि कोई संगठन आपकी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, आपकी रुचि के अनुरूप है तो उससे अवश्य जुड़ जाइए अन्यथा चतुराई के साथ इस तरह मना कीजिए- 'बहुत खुशी है कि आपने मुझे इस योग्य समझा कि मैं आपके साथ जुड़ सकूँ। आपके संगठन के बारे में मैंने बहुत कुछ सुन रखा है, आप लोग अच्छा काम कर रहे हैं, बधाई देने लायक लेकिन मेरी व्यस्तता आपके प्रस्ताव को स्वीकार करने की इजाज़त नहीं दे रही है अन्यथा मैं साथ अवश्य आता। भविष्य में यदि मुझे सुविधा हुई तो मैं आपको स्वयं खबर करके बुला लूँगा।'
कभी-कभी ऐसे व्यक्ति को इंकार करना मुश्किल होता है जो अपनी परेशानी का चतुराई से इशारा करता है। जैसे, एक मित्र ने आपको फोन किया- 'एक काम के सिलसिले में तुम्हारे शहर आना हो रहा है लेकिन यार, तुम्हारे यहाँ होटल बहुत मंहगे हैं!'
आपको यह समझने में देर नहीं लगनी चाहिए कि उसकी मंशा आपके घर में रुकने की है लेकिन उसने साफ-साफ न कह कर आपका मन टटोलने की कोशिश की है। वास्तव में, वह चाहता है कि घर में रुकने का प्रस्ताव आप स्वयं रख दें। यदि आप सहमत है तो कोई समस्या नहीं लेकिन यदि असहमत हैं तो आप इस तरह जवाब दे सकते हैं- 'हाँ यार, क्या करोगे? होटल बहुत मंहगे होते जा रहे हैं इसलिए तुम्हें इस परेशानी से जूझना पड़ रहा है।' इतना कहने के बाद चुप हो जाइए और बात को समाप्त कर दीजिए।
आप यह भी कह सकते हैं- 'तुम्हारे लिए ये कौन सी बड़ी मुश्किल है? तुम तो समस्याओं के हल निकालने में उस्ताद हो, यार।'
एक और तरीका है, 'मेरे घर में रुक सकते थे तुम लेकिन उन दिनों हम लोग शहर से बाहर जा रहे हैं।'
किशोर और युवावस्था में जो पुरुष सिगरेट, तंबाखू, शराब और नशीली दवाओं के दोस्ताना प्रस्ताव को नहीं टाल पाते, वे इनकी आदतों के शिकार हो जाते हैं और अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के साथ अन्याय कर बैठते हैं। इस स्थितियों में महत्वपूर्ण यह होता है कि आपका खुद पर कितना नियंत्रण है! सोचिए, यदि आपका स्वयं पर नियंत्रण नहीं है तो दूसरों को कैसे नियंत्रित करेंगे? मजबूती के साथ मना कीजिए, आपकी मजबूती का असर पड़ेगा। हो सकता कुछ दोस्त हाथ से निकल जाएँ, चिंता मत करिए, बहुत मिलेंगे। 'सामने वाला क्या सोचेगा' इस प्रश्न को अपने ऊपर हावी मत होने दें। अपने से जुड़े फैसले दूसरों पर क्यों छोड़ना? रिश्तेदारी और यारी सलाह-मशविरे के लिए ठीक हैं लेकिन गंभीर निर्णय अपनी बुद्धि की मदद से लें। सबकी सुनें, उस पर मनन करें और अपने मन की करें। याद रखिए, आपका अन्तर्मन आपका सबसे अच्छा मित्र और मार्गदर्शक है, उसकी आवाज़ को अनसुना करना बुद्धिमानी नहीं है। सोचने-समझने को भरपूर समय दीजिए लेकिन उसकी रज़ाई ओढ़कर सोने का प्रयत्न न करें। समय पर लिया गया निर्णय सुफल देता है।
साफ-साफ बात करने वाले लोग किसी को भी तड़ से इंकार करने का साहस रखते हैं। उनका तर्क है कि तुरंत इंकार कर देने से गलतफहमियाँ नहीं बढ़ती और किसी का समय नष्ट नहीं होता। बात सही है लेकिन समस्या यह है कि मना करने का तरीका क्या हो? आप इंकार कर दें फिर भी आपके संबंध यथावत बने रहें- यही जानने-समझने की बात है। साफ इंकार करने की जगह आप उसे यह बताएं कि उसकी बात मानने में क्या अड़चन है? अपनी असुविधा को सहृदयतापूर्वक समझाएँ, उसे बुरा नहीं लगेगा। विश्वप्रसिद्ध अभिनेता पाल न्यूमेन एक रेस्तरां में अपने मित्र के साथ खाना खा रहे थे, उसी समय उनके एक प्रशंसक ने उनका 'ऑटोग्राफ' मांगा। उन्होंने दृढ़ता से मुस्कुराते हुए कहा- 'Sorry gentleman, during dinner I don't enjoy it.' मना करने के ये तरीके आपको मजबूती देते हैं और सुखद होते हैं। जवाब देने के आपके लहज़े में रूखापन नहीं, सदाशयता झलकनी चाहिए। आपकी 'बाडी लेंगवेज़' सरोकारी हो लेकिन विचार एकदम दृढ़।
केवल हमारी-आपकी व्यक्तिगत समस्या नहीं है यह, व्यापार और सेवाओं की दुनिया में भी यह कठिनाई महसूस होती है। अब जब बैंकिंग का व्यवसाय नया रूप ले रहा है तब बैंक अधिकारियों की भूमिका अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई है। कर्ज़ देना ज़रूरी है और उसे डूबने से बचाना भी। इसलिए वे शुरू से ही अपनी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए अपने कदम आगे बढ़ाते हैं और उसी परिप्रेक्ष्य में निर्णय लेते हैं। उनका संकोच करना, खुद को मौत के कुएं में ढकेलना जैसा सिद्ध हो सकता है। मार्केटिंग सेक्टर में बिक्री बढ़ाने का दबाव और बिके माल की नियमित वसूली का संकट बढ़ते जा रहा है। बिक्री और वसूली में तालमेल बिठाना बहुत कठिन होता है। ऐसे समय में स्पष्ट दृष्टिकोण और सतर्कतापूर्ण रुख अपनाना सही होगा। 'किसे इंकार करना', 'कब इंकार करना', 'कितना इंकार करना' और 'कैसे इंकार करना', ये सब आपकी सुविचारित रणनीति के अनुसार होना चाहिए। हेनरी फोर्ड ने कहा था- 'सफलता का रहस्य दूसरों के दृष्टिकोण को समझने और साथ ही साथ अपने दृष्टिकोण को भी समाहित करने में है।'
यदि मना करना अनिवार्य हो तो शालीनता से मना करने के कुछ अनुभूत उपाय हैं, जैसे :
(1) वार्तालाप के समय आपके चेहरे पर उत्सुकता, सौम्यता के साथ शांत मुस्कान होनी चाहिए। शरीर की भाषा सहज हो।
(2) समस्याग्रस्त व्यक्ति की मनोभावना का आदर करें, उसकी बात को सुनकर समझने की कोशिश करें। ऐसा न दर्शाएँ कि आपके पास समय की कमी है, ऐसे समय में घड़ी देखना खतरनाक सिद्ध होगा।
(3) सामने वाले की बातें सुनते समय सकारात्मक ढंग से सिर हिलाएँ, आँखों से आँखें मिलाकर उसकी बातें सुनें और ईमानदारी से विचार करें कि मदद का कोई उपाय आपके पास है क्या?
(4) उसकी समस्या पर गौर करें, उसके दृष्टिकोण को समझने की कोशिश करें। बातचीत के दौरान उसके प्रयासों की प्रशंसा करें और उसकी योजनाओं के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया प्रदर्शित करें। यदि कोई गलती नज़र आती हो तो बहुत सावधानी से उस ओर इशारा करें ताकि अपनी गलती वह स्वयं समझ सके।
(5) उसे मना करने के लिए तर्क-वितर्क का सहारा न लें। आप तर्क जीत सकते हैं लेकिन मनुष्य हार जाएंगे। ऐसे मौके पर आपकी शालीनता और व्यवहारकुशलता की परीक्षा होती है।
(6) अपनी बातों से उसे समझाने की कोशिश करें, वस्तुपरक बातें करें, कम बोलें क्योंकि उल्टे-सीधे बहाने सबको समझ आते हैं।
(7) इंकार करने में शर्मिंदगी महसूस न करें, इंकार करना कोई अपराध नहीं है।
सामान्यतया जिसकी 'हाँ' करने की आदत होती है वह हाँ करता है और जिसकी 'न' करने की आदत होती है उससे कोई कुछ कहता ही नहीं है। इसका एक अर्थ यह भी है कि सबकी जरूरतों को समझने वाला सरल स्वभाव वाला व्यक्ति सबकी जरूरतों पर ध्यान देने वाला व्यक्ति बन जाता है और उसे परिवार में 'अच्छा व्यक्ति' घोषित कर दिया जाता है ताकि वह आजीवन अच्छा बना रहे और सबकी ज़रूरतें पूरी करता रहे। इस प्रकार जो व्यक्ति मना नहीं करता, उसका तब तक शोषण होते रहता है, जब तक वह मना करना नहीं सीखता। ऐसे सरल व्यक्तियों को धीरु भाई अंबानी की बात याद रखनी चाहिए- 'पहले स्वयं को समर्थ बनाओ, फिर दूसरे की मदद की सोचो।'
इंकार करने का यह मसला केवल बाहरी दुनिया के साथ नहीं है, घर-परिवार में भी रहता है। परिवार में एक-दूसरे का साथ देना सहज प्रक्रिया है। जहां तक मुझे समझ में आया, भारतीय परिवेश में प्रत्येक व्यक्ति इस ढंग से प्रशिक्षित किया जाता है ताकि परिवार की जरूरतों के लिए वह मना करने के पहले सौ बार सोचे लेकिन अंत में 'हाँ' कहे। 'सर्व सुखाय' की भावना को विकसित करने का यह ऐसा अभूतपूर्व प्रयोग है जिसे पूरा विश्व अपना रहा है। प्रश्न यह है कि अपने परिवार में कितना 'हाँ' करना और कब 'न' करना?
हम सब इस प्रकार की स्थितियों से दो-चार होते रहते हैं। तनिक सावधानी और होशियारी के साथ इन उपायों का उपयोग कीजिए, आप बिना नाराज़ किए लोगों को बड़ी सरलता से इंकार कर सकेंगे। वैसे, हर इंसान को मददगार बनना चाहिए लेकिन मदद करने की भी सीमा होती है, उसका ध्यान रखते हुए निर्णय लिया जाना चाहिए। किसी को मना करना भी स्वप्रबंधन का अंग है। प्रयत्न करके आप इस कला में माहिर बन सकते हैं।
निष्कर्ष यह है कि सबसे पहले किसी भी व्यक्ति को इंकार करने के पूर्व यह निश्चित करें कि आप सामने वाले व्यक्ति और उसकी समस्या को समझने की दिली कोशिश कर रहे हैं। दूध का जला छाछ भी फूंककर पीता है, देखिए, शायद इस बार पीने लायक हो। इसके लिए ज़रूरी है कि आप नकारात्मक भावनाओं पर नियंत्रण रखें। आपके आसपास के लोग आपसे समझदारी की उम्मीद करते हैं और आपकी समझदारी आपको परिपक्व व्यक्ति बनाती है। यह जीवन का बड़ा पुरस्कार होगा कि लोग आपको एक मददगार इंसान के रूप में जानें या याद करें इसलिए आपका सकारात्मक व्यवहार ही सही निर्णय लेने में सहायक होगा। ज़रूरत इस बात की है कि आप अपनी सोच में संगीत की तरह संतुलन स्थापित करने की कोशिश करें। आप तो जानते हैं कि संतुलन बिगड़ने से संगीत बेसुरा हो जाता है।
जितना इंकार करना ज़रूरी है, उतना ही किसी की सहायता करना भी। निश्चयतः किसी का बोझ ढोना समझदारी नहीं है पर क्या स्वयं समाज पर बोझ बन जाना उचित है? यदि 'हाँ' और 'न' में संतुलन साधकर व्यवहार करते हैं तो आप निश्चयतः सुखी और संतुष्ट व्यक्ति के रूप जीवन का आनंद ले सकेंगे।
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Monday, October 24, 2016

कल्पवृक्ष : अभिप्रेरणा : कार्य संस्कृति

समाज शास्त्री अब्राहम मास्लो का निष्कर्ष है - 'यदि मनुष्य को कुछ किए बिना खाने को मिल जाए तो वह अपने बिस्तर से नहीं उठेगा।'

वह 'भूख' है जो मनुष्य को काम करने के लिए मज़बूर करती है। इसका एक निहितार्थ यह भी है कि मनुष्य परम आलसी जीव है ! किसी भी उम्र का मनुष्य हो, वह काम करने से बचना चाहता है, काम न करने के बहाने खोजता है। योग के कार्यक्रम को देखकर स्वस्थ होना चाहता है लेकिन योग करना नहीं चाहता। 'खाना ख़जाना' के कार्यक्रम को मन लगाकर देखनेवालों की कमी नहीं लेकिन किचन में उन डिशों को बनाकर खाने-खिलाने वाले बिरले होते हैं। सुबह जागने का संकल्प करनेवाले अलार्म बजने पर अलार्म के आविष्कारक को को मन ही मन गरियाते हैं और उसे 'ऑफ' करके और अच्छे से सो जाते हैं। इस प्रकार के अनेक उदाहरण हमारे आसपास बिखरे हुए हैं जो हमारे आलस्य का गुणगान करते पाए जाते हैं। अब, स्वभाव से जन्मजात आलसी इस व्यक्ति को काम से लगाना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है।

जैसे, सरकारी सेवा में पदानुक्रम होते हैं। इस क्रम में सबके ऊपर कोई न कोई होता है। हर व्यक्ति स्वयं को 'बॉस' समझता है लेकिन बॉस कोई नहीं होता, हर कोई अधीनस्थ होता है। हर कोई अपने अधीनस्थ को धमकाकर या उसे चमकाकर काम लेता है क्योंकि हमारे बाप-दादों के जमाने से यही परिपाटी चली आ रही है, हमने वही सीखा है। यह सामंतवादी उपाय सुधारवादी प्रयोग की देन है जिसका असर सरकार में है, समाज में है, व्यापार में है और परिवार में भी है। बीसवी सदी के आरंभ में अनेक समाजशास्त्रियों ने मानव मन की गहराई में जाकर यह समझने की कोशिश की कि इस आलसी जीव से कैसे काम लिया जाए ?

समस्या यह है कि आलसी व्यक्ति को सक्रिय कैसे किया जाए!

आलस्य की शुरुआत मनुष्य के बचपन से होती है। ये प्रारम्भिक वर्ष बड़े मज़े के होते हैं। आराम से पड़े हैं, दिन में बीस-बीस घंटे सो रहे हैं, भूख लगी रो रहे हैं। माँ दौड़कर आएगी और दूध पिलाएगी। हगने-मूतने के लिए भी कहीं उठकर नहीं जाना है, सब बिस्तर पर हो रहा है और बिना किसी स्व-प्रयास के साफ हो रहा है। बदन की मालिश हो रही है, नहलाया जा रहा है, कपड़े बदले जा रहे हैं, सजाया-संवारा जा रहा है। कितना अच्छा हो कि मनुष्य का पूरा जीवन ऐसी ही सुख-सुविधा में बीते! लेकिन जैसे ही उम्र बढ़ती है, परिवार में बच्चे को आत्मनिर्भर बनने का प्रशिक्षण दिया जाता है। उम्मीद की जाती है कि दस वर्ष का होते-होते वह अपने काम खुद करने लगे। आत्मनिर्भर बनाने का यह दौर उसके भावी व्यवहार के लिए निर्णायक होता है। इस शिक्षण अवधि में यदि उसने सक्रियता का पाठ पढ़ लिया तो वह आजीवन सक्रिय रहेगा और अगर इसे न सीख पाया तो पूरा जीवन अजगर की तरह गहरी सांस लेगा और उम्मीद करेगा कि उसका भोजन उसके पास उड़ कर उसके पास चला आए।
दो आलसी एक बेर के पेड़ के नीचे लेटे थे। पेड़ में बेर के फल लटक रहे थे। एक ने दूसरे से कहा- 'कितना अच्छा हो कि बेर टपक का गिर जाए तो हम लेटे-लेटे खा लें।'
दूसरे ने उसे डपटते हुए कहा- 'चुप, बेर इधर-उधर गिर जाएगी तो उसे उठाने के लिए उठना पड़ेगा, कितना अच्छा हो कि बेर सीधे मुंह में आकर गिरे।'

बचपन में मनुष्य को कुछ समझ नहीं आता। माता-पिता और शिक्षक की नाव में बैठकर उस उम्र को बिताना होता है। वे नाव को जिस दिशा में ले जाए या जो कहें, वह सही मानना होता है। किशोरावस्था में ही हमें अपनी समझ और बुद्धि को परिमार्जित करना अत्यंत आवश्यक है। आप इस बात से सहमत होंगे कि इस कालखंड में मनुष्य के समक्ष अनेक चुनौतियाँ रहती हैं, जैसे, वह अच्छा छात्र बनना चाहता है लेकिन उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता, उत्कृष्ट खिलाड़ी बनना चाहता है लेकिन खेल के मैदान में सांस फूलती है, घर के काम में दक्ष होने की अभिलाषा है लेकिन वह कष्टसाध्य है, आदि। अपनी ऐसी मनोदशा में किशोर बहाने बनाना आरंभ कर देता है और परिश्रम से बचने के ये प्रयत्न उसे आलसी स्वभाव का बना देते है। काम से बच निकलने की यह यात्रा आजीवन चलती है, कोई काम करने को कहे तो बुरा लगता है, परिणामस्वरूप मनुष्य के विकास की गति धीमी पड़ जाती है।

मनुष्य की कार्यशैली के तीन रूप होते हैं, सक्रिय, अर्धसक्रिय और असक्रिय। सक्रिय वे लोग है जो परिश्रम को पूजा मानते हैं और ज़िम्मेदारी की गंभीरता को समझते हैं। ऐसे लोगों को आप आराम से बैठे या ऊँघते या आँखें बंद करके पसरे हुए नहीं पाएंगे। इन्हें काम दिखता है, सूझता है और जब तक काम पूरा न हो, इन्हें चैन नहीं पड़ता। सक्रियता का यह गुण आपको भारत उपमहाद्वीप की गृहणियों में बहुतायत से मिलेगा। गृहणियाँ घर के काम को जिस सूझ-बूझ और परिश्रम से संपादित करती हैं, वह किसी बड़ी कंपनी के प्रबंध-संचालक के काम से कम नहीं होता। उनका किचन प्रबंधन की पाठशाला है, उनका घर सुप्रबंधन का विश्वविद्यालय है। घर व्यवस्थित रखने का उनका बुद्धि-कौशल और भोजन बनाने से लेकर चौका समेटने तक का उनका परिश्रम उनकी बौद्धिक और शारीरिक सक्रियता का जीता-जागता उदाहरण है।

अर्धसक्रिय वे होते हैं जो हर समय सक्रिय नहीं होते बल्कि अपने 'मूड' से संचालित होते हैं। इनमें से अस्थिर स्वभाव के लोग कुछ खास अवसरों पर, या किसी खास व्यक्ति को देखकर या किसी को अपनी सक्रियता दिखाने के लिए सक्रिय होते हैं। इस श्रेणी के प्राणी कठिन कार्यों से खुद को दूर रखते हैं और 'यह काम मुझसे नहीं होगा' कहकर काम को दूसरों की तरफ खिसकाने के विशेषज्ञ होते हैं। वहीं पर स्थिर स्वभाव के लोग परिस्थिति की गंभीरता और महत्व को देखते हुए सक्रिय होते हैं लेकिन उस कार्य को पूरा करने के बाद चुपचाप बैठ जाते हैं। ऐसे लोग किसी के आग्रह करने पर प्रेरित होकर काम करते हैं लेकिन 'लग कर' काम करना इनके स्वभाव में नहीं होता। कई बार सक्रिय लोग दूसरों को काम न करता देखकर नाराजगी में अपनी सक्रियता कम कर देते हैं और अर्धसक्रिय हो जाते हैं।

तीसरी जमात है, असक्रिय लोगों की। यह धरती इन्हीं का बोझ उठाते हुए त्रस्त है। ये शारीरिक रूप से शिथिल लेकिन मानसिक रूप से प्रबल होते हैं। ये हर काम करना चाहते हैं, योग्य भी हैं लेकिन इनसे काम नहीं होता। बातें करने, बातें बनाने और दूसरे के किये कार्य पर मीनमेख निकालने में प्रवीण होते हैं। काम करने वाले की हंसी उड़ाना, ताने मारना और हतोत्साहित करना इनका प्रिय कार्य होता है क्योंकि इस उपाय के माध्यम से इनका काम न करना छुप जाता है। असक्रिय लोग अपनी असक्रियता को किसी संक्रामक रोग की तरह फैलाते हैं और अनेक सक्रिय लोग इनके प्रभाव में सहज ही आ जाते हैं। हमारे देश की आज़ादी के बाद की धीमी प्रगति में भ्रष्टाचार का जितना योगदान है, उतना ही इन आलसियों का भी है।

जो काम कर सकता है लेकिन नहीं करता, वह समाज पर बोझ नहीं तो और क्या है?

आम तौर पर सरकारी नौकरी मज़े के नौकरी मानी जाती है। नौकरी पक्की हो जाए तो काम करना या न करना- शासकीय सेवक की मर्जी से जुड़ा हुआ है। 'कंफर्म' होने के पहले और उसके बाद के काम करने की गुणवत्ता में पर्याप्त अंतर देखा जाता है। इससे यह निष्कर्ष भी निकाला जा सकता है कि काम करने का संबंध डर से है जिसमें नौकरी छिन जाने का डर सबसे बड़ा है। ऐसे अनेक उदाहरण देखने में आते हैं जहां ऐसे महानुभावों से काम लेने के लिए डांट-डपट, धमकी और अपशब्दों का सहारा लेना पड़ता है। यह विचारणीय है कि संगठन में इस तरह का माहौल क्या उचित है? क्यों लोग काम करने से विमुख हो जाते हैं, उनका उत्साह भंग हो जाता है ? क्या पढ़े-लिखे लोकतान्त्रिक समाज में 'चमकाइटिस' के अस्त्र का प्रहार न्यायोचित है? क्या संगठन में इस तरह का माहौल उचित है? क्यों लोग काम करने से विमुख हो जाते हैं, उनका उत्साह क्यों भंग हो जाता है?

दबाव के अधीन या डर के वशीभूत किए गए कार्य अपेक्षित परिणाम नहीं देते जबकि सरकारी, अर्धसरकारी या निजी संगठनों में कामगार को उत्साहित करने की जगह उनसे डरा-धमका कर कार्य लिया जाता है इसलिए काम की गुणवत्ता कमजोर होती है। यह विधा हमें अपने परिवार से उत्तराधिकार में मिली है जो हमारे  साथ चल रही है। आधुनिक युग सामने वाले को बढ़ावा देकर, उत्साहित कर और चुनौती देकर काम करवाने का है। दादागिरी के दिन गए लेकिन हम अभी भी आदिमयुगीन प्रबंधन शैली को गले लगाए घूम रहे हैं।

उत्साह भंग होने की मुख्य वजह है, उत्साह की अस्थिरता। किसी काम को अपना काम समझकर करेंगे तो आपका उत्साह बना रहेगा लेकिन जैसे ही काम बोझ बना, उसे करने में रुचि खुद-ब-खुद कम होने लगेगी और उत्साह भी कम हो जायेगा।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने कहा है- 'अपने जीवन के हर पल आप जो भी करें, वह स्वेच्छा से करें, अनिच्छा से नहीं क्योंकि जिस पल अनिच्छा आती है, उस पल अगर कोई बहुत खूबसूरत चीज भी आपके साथ घटित हो रही होगी, तो वह भी आपको ऐसी लगेगी जैसे जिंदगी आपको परेशान कर रही है। अगर आप इच्छुक हैं तो बड़ी ही अच्छी बात है।'

किसी समूह में यदि लोग काम ठीक से नहीं कर रहे हैं, या काम करने से बचते हैं तो इसका एक ही कारण है- कार्य संस्कृति का विकसित न होना। प्रबंधन-गुरु शरू रांगड़ेकर ने कार्य संस्कृति का वर्गीकरण इस प्रकार किया है :

#आराम जीवन-मूल्य : आराम पसंद लोग प्रत्येक समूह में पाए जाते हैं। इनका जीवन-मंत्र है- 'आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों; जल्दी जल्दी क्यों करता है, अभी जीना है बरसों।' ये लोग काम न करने या उसे टालने या किसी दूसरे पर काम थोपने के विशेषज्ञ होते हैं। लच्छेदार बातें करना, बातें बनाना और बहाना करना- इनका अदृश्य गुण होता है। ये लोग कार्यालय का काम भले न करें लेकिन 'साहब का काम' करने में विशेष दक्ष होते हैं। कई साहब तो इनकी प्रतिभा से इस कदर प्रभावित रहते हैं कि इनकी राय लेकर 'स्टाफ मेनेजमेंट' करते हैं ! ऐसे लोग सरकारी-गैर सरकारी कार्यालयों में, उद्योग-व्यापार में, खेत-खलिहान में, घर-परिवार में- अर्थात यत्र-तत्र-सर्वत्र मिल जाएंगे। ये अपनी निष्क्रियता को छुपाने के लिए सक्रिय होने का ढोंग करने, काम करने वाले व्यक्ति का उपहास करने और एक-दूसरे को लड़ाने-भिड़ाने की कला में प्रवीण होते हैं।

#अर्थ जीवन-मूल्य : इस श्रेणी के लोग अर्ध-सक्रिय मानसिकता के होते हैं जो अपनी सेवाएँ यथोचित मूल्य प्राप्त होने पर ही देते हैं। डाक्टर, वकील, सी॰ए॰, आर्किटेक्ट, कंसल्टेंट जैसे 'प्रोफेशनल्स' अपनी काबिलियत को निःशुल्क नहीं देते बल्कि मनचाही कीमत वसूल करते हैं। सरकारी-अर्ध सरकारी संस्थानों में इस स्वभाव के कर्मचारी अपने वेतन के अतिरिक्त वसूली करते हैं जिसे बोलचाल की भाषा में रिश्वत कहा जाता है।

#कार्य जीवन-मूल्य :  'काम ही पूजा है' के सिद्धान्त को मानने वाले लोग ही इस दुनिया को संचालित कर रहे हैं। इन्हें काम करने में मज़ा आता है और जब तक सौंपे गए काम को ये पूरा नहीं कर लेते- इन्हें चैन नहीं आता। सिर्फ अपना ही नहीं, अपने सहयोगियों का काम भी अपने सिर पर ले लेने से इन्हें कोई परेशानी नहीं होती। अतिरिक्त पैसा, प्रमोशन आदि प्रलोभनों का इनके काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ये कार्यस्थल की ऐसी रक्तवाहिनी धमनियाँ हैं जो बिना शोर किए अपना कर्तव्य पूरा करती हैं।

यह रोचक तथ्य है कि आराम जीवन-मूल्य वाले महानुभावों का असर कार्य जीवन-मूल्य वालों पर तेजी से होता है लेकिन इसका उल्टा बहुत कम होता है। काम करने वाला मनुष्य भिड़कर काम करता है, हर समय खटते रहता है और अपने अधिकारी से भरपूर डांट भी खाता है। यह दुनिया का रिवाज है कि डांट उसे पड़ती है जो गलती करता है, गलती वह करता है जो काम करता है ! इसलिए काम करने वाले का उत्साह धीरे-धीरे कम होते जाता है और वह आराम जीवन-मूल्य को अपनाने लगता है, परिणाम स्वरूप पूरा कार्यस्थल 'आफिस-आफिस' बन जाता है।

'गुड गवर्नेंस' के लिए कार्यस्थल का कार्यनुकूल वातावरण बहुत मायने रखता है। आराम-जीवनमूल्य और अर्थ-जीवनमूल्य वाले लोगों को कार्य-जीवनमूल्य की भावना से जोड़ना ही प्रशासक, प्रबन्धक या गृहस्वामी का कार्य होता है। आरामपसंद लोगों को काम से लगाना चुनौतीपूर्ण और कठिन है लेकिन जो लोग स्वयं कर्तव्यनिष्ठ होते हैं, वे अपने आसपास के माहौल को इस तरह 'चार्ज' कर देते हैं कि काम न करने वाले को अपराधबोध होने लगता है, फलस्वरूप वह खुद में बदलाव लाता है और सक्रिय हो जाता है। परिश्रमी और ईमानदार प्रबन्धक सबको अपने ढंग से संचालित करने का माद्दा रखते हैं।


अधिकतर कार्यस्थलों में यथास्थिति बनाए रखने के प्रयास होते हैं जिसके फलस्वरूप कार्यशैली में परिवर्तन दिखाई नहीं पड़ता और स्थिति दिनों-दिन बिगड़ती जाती है। 'साहब' यदि साहब है तो वह चाहे जितना चीखे-चिल्लाए, कोई खास परिवर्तन नहीं होता। वह सामने से हटा और उसका असर घटा। 'चेम्बर' में अपनी आराम कुर्सी में बैठा अधिकारी अपने अधीनस्थों को प्रेरित करने में सफल नहीं हो सकता. उसे अपने अधीनस्थों को काम समझाने और काम लेने के लिए बाहर निकलकर उनके साथ भिड़ना होगा, तब बात बनेगी। कुशल नेतृत्वकर्ता संगठन में अपनी कर्मठता से स्थायी प्रभाव पैदा करते हैं। वे सामने हों, या न हों, उनका 'सिस्टम' काम करता है।

काम करने की रुचि कम होने का एक बड़ा कारण यह है कि रोज-रोज एक जैसा काम करते हुए ऊब होने लगती है। एक बार मुझे बंबई (उस समय मुंबई नहीं था) के कफ परेड पर स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की 18वी मंजिल में प्रशिक्षण हेतु जाना था। साथ में मेरी पत्नी माधुरी भी थी। अंदर प्रवेश करते ही हमें सामने दो 'लिफ्ट' दिखी। एक लिफ्ट का दरवाजा खुला था जिसमें लोग घुस रहे थे, हम दोनों उधर लपके लेकिन 'ओवर लोड' की समस्या के कारण अंदर नहीं घुस पाए इसलिए दूसरी लिफ्ट की ओर पहुंचे। लिफ्टमेन लिफ्ट के बाहर एक स्टूल पर बैठा हुआ था, उसकी लिफ्ट का दरवाजा बंद था। मैंने उससे पूछा- 'लिफ्ट बंद है क्या?'
'चालू है।' उसने ठंडा जवाब दिया।
'ले चलो।'
'उस लिफ्ट में चले जाइए।'
'आप क्यों नहीं ले जा रहे हैं, आपकी तबीयत ठीक नहीं है या लिफ्ट की?'
'दोनों ठीक हैं, वो देखिए, लिफ्ट आ गई।' उसने हमें सुझाव दिया लेकिन मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी और कहा- 'कोई बात नहीं, हम लोग थोड़ी देर बाद चले जाएंगे, आप ये बताओ कि आज आप सुस्त क्यों दिख रहे हैं?'
'सुबह से लेकर रात तक एक ही काम है साहब, ऊपर जाओ, नीचे आओ।'
'वही तो तुम्हारी ड्यूटी है।'
'ड्यूटी है लेकिन ऊब हो जाती है।'
'यह काम पसंद नहीं तो कोई दूसरा काम ढूँढना चाहिए।'
'दूसरी नौकरी कहाँ मिलेगी?'
'तो इस काम को मज़े से करना चाहिए।'
'आप केवल बात कर रहे हो साहब, आपके ऊपर पड़ेगा तो समझ में आएगा।'
'मैं जो काम करता हूँ, मुझे भी रोज-रोज वही करना पड़ता है।' मैंने उसे बताया। मेरी बातों से वह खिन्न हो रहा था लेकिन लिफ्ट खोलने के लिए तैयार नहीं हुआ। इतने में दूसरी लिफ्ट फिर वापस आ गई। माधुरी जी ने मुझसे कहा- 'चलो न, उस लिफ्ट से चलते है, देर हो रही है। तुम क्यों अपना सिर खफा रहे हो?' वह लिफ्टमेन अपनी स्टूल पर बैठा ही रहा, नहीं हिला तो नहीं हिला।

खैर, हम लोग सक्रिय लिफ्ट में प्रविष्ट हो गए लेकिन मेरे दिमाग में एक और घटना तैर गई। मेरे बिलासपुरिया मित्र भूपेन्द्र जोबनपुत्रा के विवाह में मैं बाराती बनकर कलकत्ता (उस समय कोलकाता नहीं था) गया था। कार्यक्रम का आयोजन भवानीपुर में लक्ष्मीनारायण मंदिर के विवाह भवन में था। उस समय सुबह का नौ बजा रहा होगा, मैं अन्य बरातियों के साथ समारोह स्थल में पहुंचा। वैवाहिक कार्यक्रम तीसरी मंजिल में था। ऊपर जाने के लिए एक लिफ्ट थी जिसमें एक पाँच-फुटिया लिफ्टमेन जिसने सफ़ेद रंग का 'यूनिफ़ार्म' पहना हुआ था, सफ़ेद टोपी पहनी थी, माथे में लाल तिलक लगा हुआ था, ने दोनों हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए हमें 'जय राम जी' कहा और ऊपर ले जाकर छोड़ा। सुबह का नास्ता हुआ, उसके बाद अनुष्ठान हुआ, फिर दिन का भोज हुआ, धीरे-धीरे शाम होने को आई। इस बीच मैं तीन बार उस लिफ्ट से ऊपर-नीचे हुआ, वही लिफ्टमेन, वही मुस्कुराहट, वही 'जय राम जी'। उनके माथे पर शिकन नहीं, थकान का कोई चिन्ह नहीं।

उनके काम की लगन ने मुझे समझाया कि काम कोई भी हो, छोटा नहीं होता और न ही उबाऊ। जो भी काम हाथ में आए उसे दिल लगा कर करो, खुश होकर करो। जो व्यक्ति स्वप्रेरित होता है वह काम को रुचिकर बनाने के नए-नए उपाय खोजता है और अपना कार्य करने में आनंद का अनुभव करता है। दूसरों को प्रेरित करने से पूर्व स्वयं को प्रेरित करना अति आवश्यक है अन्यथा आपके द्वारा प्रभावित करने के प्रयास निष्फल हो सकते हैं। परिश्रमी व्यक्ति ही दूसरों के लिए प्रेरणाश्रोत बन सकता है। काम करने का माहौल सबको काम से लगाता है, यही अभिप्रेरणा का मूलमंत्र है।

किसी का शरीर आलसी नहीं होता, शरीर में कार्य करने की अपार क्षमता होती है। दरअसल शरीर मन के निर्देश पर सक्रिय होता है। जिस व्यक्ति का अपने मन पर नियंत्रण है वही अपने तन को नियंत्रित कर सकता है। इसके लिए मन को स्थिर करना पड़ता है, मन को स्थिर करने के लिए मन को साधना पड़ता है, यह एक अभ्यास है जिसे सीखा जा सकता है और अपनाया जा सकता है। संसार में सुनियोजित परिश्रम और सम्पूर्ण ईमानदारी का कोई विकल्प नहीं है। जिसने यह सूत्र समझ लिया, समझ लीजिए, वह सार्थक जीवन जीने की राह पर है।

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Thursday, October 6, 2016

कल्पवृक्ष : खुद की खोज

आम के पेड़ में यदि आम का फल उगे तो कैसा आश्चर्य?

हमारा दिमाग लगातार सक्रिय रहता है। जीवन में हो रही घटनाएँ अपने अनुभव के रूप में हमारे स्मृतिकोष में दर्ज़ होते रहती हैं। इन्हीं स्मृतियों के आधार पर मनुष्य के 'स्व' की रचना होती है। 'स्व' याने किसी व्यक्ति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व। यह व्यक्तित्व उसकी सोच और समझ के आधार पर विकसित होते रहता है। हर नया अनुभव उसे कुछ-न-कुछ सिखाता है जो उसके मस्तिष्क में अंकित होते रहता है। जो धारणा आज उसे सही समझ में आती हैं लेकिन कालांतर में उसके विपरीत परिणाम आने पर गलत लगने लगती है। पुरानी धारणा थी कि जलने पर घाव में पानी नहीं डालना चाहिए लेकिन अब जलने पर घाव को शीतल जल में डुबाकर रखने की सलाह मिलती है। पुरानी धारणा के एकदम विपरीत! हमने इसे अपनाकर देखा, परिणाम देखे और मस्तिष्क में अंकित पुरानी सूचना को विलोपित कर दिया और नई सूचना अंकित कर ली। इस तरह हमारे दिमाग में काट-छांट और जोड़ना-घटाना चलते रहता है। यद्यपि सभी मनुष्यों के मस्तिष्क की बनावट एक जैसी है किन्तु सबका ज्ञानबोध अलग-अलग होता है। इसीलिए किसी एक घटना विशेष के कई अर्थ निकल जाते हैं। यह अंतर भिन्न दृष्टिकोणों की वज़ह से होता है।

मनुष्य का व्यक्तित्व तीन तलों में विभाजित रहता है :
1: जैसा वह स्वयं को समझता है॰
2: जैसा दूसरे उसे जानते हैं॰
3: जैसा वास्तव में वह है॰

* जैसा वह स्वयं को समझता है:
हम लगातार अपने बारे में अपनी धारणा बनाते रहते हैं। हमारे द्वारा लिए गए निर्णय, उनका क्रियान्वयन और उनसे प्राप्त परिणाम हमारे अनुभव भंडार को बढ़ाते हैं। उन परिणामों को कसौटी मानकर हम अपनी व्यवहार नीति में आवश्यक परिवर्तन करते रहते हैं, वही हमारी कार्यशैली बन जाती है। विभिन्न परिस्थितियों में अपनाई गई शैलियाँ हमारे व्यक्तित्व का अंग बन जाती हैं जैसे, यदि हमारा काम मुस्कुराने से बन जाता है तो खुशमिजाज़ी हमारा स्वभाव बन जाता है और लेकिन यदि ज़िद करने या रोने से हमारा काम बनता है तो हम स्वभाव से जिद्दी या चिड़चिड़े बन जाते हैं। अपने स्वभाव को मनुष्य अच्छी तरह से समझता और जानता है लेकिन कभी तो स्वीकार कर लेता है तो कभी इंकार कर देता है। आलसी व्यक्ति अपने आलस्य को स्वीकार नहीं करता लेकिन काम न करने का बहाना बताकर मन-ही-मन खुश होता है।
हम सब ऐसा समझते हैं कि हम सही हैं लेकिन लोग हमें नहीं समझते। हर इंसान खुद को सीधा या भला मानता है और उसको अपनी दुष्टता और कमियाँ समझ में नहीं आती। वह अपने बारे में अक्सर भ्रामक धारणाएँ बना कर जीता है परिणामस्वरूप वह स्वयं को ठीक से नहीं जान पाता। 'मैं कैसा हूँ'- इस प्रश्न का उत्तर सदा उलझा हुआ रहता है। साधारणतया हम वही करते हैं जिसे हम उचित समझते हैं। समाज की उचित-अनुचित की सूची अलग होती है और मनुष्य की अलग। मनुष्य का उचित-अनुचित उसका विवेक होता है। जिन गतिविधियों को समाज गलत मानता है उसे गलत सिद्ध करने के अनेक मजबूत तर्क अवमानना करने वाले के पास होते हैं। अवैध लेन-देन करने वाले सहजता से तर्क देते हैं- 'क्या करें? सिस्टम से बंधे हैं।'
हमारे विवेक के द्वारा निर्धारित 'उचित' कार्य हमें वे संकेत देते हैं जिनसे हम अपने बारे में राय कायम करते हैं।

*जैसा दूसरे उसे जानते हैं :
हमारी सभी गतिविधियों पर लोगों की नज़र रहती है। दूसरे लोग अपनी सोच के आधार पर हमारे विषय में राय बनाते हैं जिसे 'पब्लिक इमेज़' कहा जाता है। लोग हमारी दिखने वाली गतिविधियों के आधार पर हमारे बारे में राय बनाते हैं जो वास्तविकता से अलग होती है क्योंकि मनुष्य उन बातों को छुपा कर रखता है जो समाज में निंदनीय होती है। कई बार जिस व्यक्ति को लोग 'अच्छा इन्सान' मानते हैं यदि उसकी असलियत उनके सामने उजागर हो जाए तो वे चकित रह जाएंगे। इसी प्रकार अच्छे व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है या उसे गलत समझ लिया जाता है परिणामस्वरूप अपनी तमाम अच्छाइयों के बावजूद एक भला व्यक्ति खलनायक घोषित हो जाता है। हमारे सामाजिक ताने-बाने में बातचीत की मृदुता और सादगी का बहुत सम्मान है, कई लोग इन्हें अपना बाहरी आवरण बनाकर अपनी मनमोहक छबि बना लेते हैं लेकिन ऐसी छबि टिकाऊ नहीं होती।
एक सच्ची घटना बताता हूँ, पुरानी बात है। मेरे एक मित्र क्रांतिकुमार ओझा जिन्हें कुंडली का ज्ञान है, मैंने अपनी जन्म कुंडली दिखाई और उनसे अतीत और भविष्य के बारे में कुछ बताने का निवेदन किया। कुंडली का अध्ययन करने के बाद उन्होंने मुझसे कहा- 'मैं तुम्हें कई सालों से जानता हूँ, तुम्हें एक सीधे-सादे इन्सान के रूप में जानता हूँ। आम लोगों में भी तुम्हारी 'इमेज' ऐसी ही है लेकिन मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ, नाराज मत होना।'
'जी, निःसंकोच बताइए।'
'तुम्हारी कुंडली में स्पष्ट संकेत हैं कि तुम बदमाश टाइप के आदमी हो।'
'ओझा जी, यह बात अभी तक केवल मुझे मालूम थी, अब आपको भी मालूम हो गई है, किसी और को मत बताना।' मैंने उनसे हाथ जोड़कर निवेदन किया।
शायर निदा फ़ाजली ने लिखा है:
'हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना हो कई बार देखना॰'

*जैसा वास्तव में वह है :
दूसरे को जानना जितना कठिन है, उतना ही खुद को जानना भी है। बात-व्यवहार की ऊपरी सतह को देखकर किसी की गहराई का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। समुद्र में तैरती बर्फ की चट्टान को देखने से जो दिखाई पड़ता है, वह विशाल चट्टान का छोटा सा हिस्सा है। यदि ऊपरी हिस्से को ही उसका वास्तविक आकार समझ लिया जाए तो बड़ी भूल हो जाएगी। ऐसी ही भूल मनुष्य के व्यक्तित्व के साथ होती है। कोई भी इन्सान किसी दूसरे को शत-प्रतिशत नहीं जान सकता लेकिन आश्चर्य यह है कि हम भी स्वयं को पूरी तरह नहीं जानते! हमें भ्रम रहता है कि हम अपने बारे में सब जानते हैं लेकिन हम अपनी सभी शक्तियों और कमजोरियों से अपरिचित रहते हैं क्योंकि हमें अपने भीतर झांक कर देखने का अभ्यास नहीं है। स्वयं की अंतर्यात्रा बिरले ही करते हैं।

प्रत्येक मनुष्य शक्तियों और कमजोरियों का मिश्रण होता है। संसार में सभी एक जैसे नहीं होते क्योंकि प्रकृति ने सबको अलग-अलग बनाया है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इसे आनुवांशिक प्रभाव मानता है। कुछ लोग नैसर्गिक रूप से उत्कृष्ट होते हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि जो उत्कृष्ट नहीं हैं वे निकृष्ट हैं। यह सही है कि लता मंगेशकर नैसर्गिक गायिका हैं, उन जैसी मधुर और सधी हुई आवाज़ में गा सकना सबके वश की बात नहीं है, लेकिन हम कुमार गंधर्व को भी जानते हैं जो फेफड़े के रोग से अनेक वर्षों तक जूझने के बावजूद केवल 'एक फेफड़े वाले' उत्कृष्ट शास्त्रीय गायक बने। बिस्मिल्ला खाँ एक सामान्य शहनाईवादक थे लेकिन अपनी संगीत साधना से उन्होंने शहनाईवादन को शास्त्रीय स्वरूप दिया और स्वयं शिखर पर पहुंचे। यह सही है कि सब में एक जैसी योग्यता नहीं होती लेकिन अगर कोई ज़िद ठान लें तो खुद में अभूतपूर्व सुधार लाकर नए प्रतिमान स्थापित कर सकता है। निरंतर प्रयास का कोई दूसरा विकल्प नहीं होता।

किसी कार्य विशेष को सम्पन्न करने की क्षमता को योग्यता कहा जाता है। योग्यता के मूल्यांकन से यह पता चलता है कि कोई व्यक्ति क्या कर सकता है और क्या नहीं। मानसिक गतिविधियों को संचालित करने के लिए बौद्धिक योग्यता चाहिए जबकि शरीर के माध्यम से किए जाने वाले कार्यों के लिए शारीरिक योग्यता आवश्यक होती है। इस बात को इस तरह समझने की कोशिश करते हैं:

बौद्धिक योग्यता :
* जो कुछ सुना या पढ़ा जाए उसके शब्दों के गूढ़ार्थ को समझने की क्षमता
* समस्या और उसके समाधान को तार्किक क्रमबद्धता से जानने की क्षमता
* तर्क का उपयोग तथा तर्क-वितर्क के परिणामों का मूल्यांकन करने की क्षमता
* स्मरण रखने की क्षमता
* गणितीय कार्य को तेजी और सटीकता से कर सकने की क्षमता
* उचित-अनुचित का भेद कर सकने की क्षमता
* समानताओं और असमानताओं को सटीक पहचानने की क्षमता  
* किसी परिवर्तन की दशा में परिवर्तन के बाद कैसा होगा, यह कल्पना कर सकने की क्षमता

शारीरिक योग्यता :
* अपनी पेशियों की शक्ति से लगातार और बार-बार परिश्रम कर सकने की क्षमता
* किसी वस्तु को धकेलने या खींचने की क्षमता
* शरीर की पेशियों में लोच बनाकर रखने की क्षमता
* शरीर के उपयोग के समय सभी अंगों में तालमेल रख सकने की क्षमता
* शरीर को संतुलित रखने की क्षमता
* लंबे समय तक अधिकाधिक कार्य कर सकने की क्षमता

बौद्धिक और शारीरिक योग्यता के संतुलित उपयोग से मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। असंतुलन से व्यक्तित्व में दोष आने लगते हैं जैसे वुद्धि विकास पर अधिक ध्यान देने वाले लोग शारीरिक रूप से निष्क्रिय हो जाते हैं जिसका परिणाम होता है: कमजोरी, बीमारी, चिचिड़ाहट और उदासीनता। वहीं पर शारीरिक क्षमता बढ़ाने वालों का पढ़ाई में मन नहीं लगता और वे हर समय अपनी शक्ति के प्रदर्शन और उसके विसर्जन के मौके तलाशते रहते हैं। ये दोनों स्थितियाँ घातक हैं। दोनों क्षमताओं में संतुलित विकास करना, दोनों के लिए पर्याप्त समय निकालना और किसी भी अति से बचना श्रेयस्कर होगा।

यदि तन स्वस्थ नहीं है तो मन उदास रहेगा और यदि मन प्रसन्न नहीं है तो तन कैसे साथ देगा?
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Wednesday, October 5, 2016

कल्पवृक्ष : चाहो और पा लो

आकाश में जड़े सितारों को पाने की ललक किसमें नहीं?

जन्म से मृत्यु तक की यात्रा में मनुष्य के समक्ष चुनौतियों के अंबार लगे रहते हैं। हममें से ज़्यादातर लोग अपनी पूरी ज़िंदगी पेट और पेट के नीचे की आग बुझाने में ही बिता देते हैं। वैसे, ये ज़रूरी भी है क्योंकि ये हमारी भौतिक आवश्यकताएँ हैं। सृष्टि के अन्य जीवधारी भी जीवन रक्षा के लिए प्रयास करके ज़िन्दा रहते हैं और अपनी वंशवृद्धि करते हैं लेकिन उनके और हमारे बुद्धिस्तर में अंतर है। बुद्धि हमें सोच प्रदान करती है और हमारा दृष्टिकोण विकसित करती है। संभवतः इसीलिए मनुष्य अपनी क्षुद्र आवश्यकताओं से ऊपर उठकर ऐसे कार्य करता है जो उसे अन्य जीवधारियों की तुलना में श्रेष्ठ बनाता है। अलग हटकर कुछ करने की ललक ने मनुष्य जाति को सभ्य होने का गौरव दिलाया है। इस सृष्टि के इतिहास की यह अद्भुत उपलब्धि है।

जन्म के बाद माँ के स्पर्श का आल्हाद, शैशवकाल में किसी की गोद में सवार होने का आनंद, बाल्यावस्था में सबके साथ शामिल होने की चाह, किशोरावस्था में कुछ कर दिखाने का जुनून, युवावस्था में संघर्ष करने की अदम्य इच्छाशक्ति और जीवन के उत्तरार्द्ध में शिखर तक पहुँचने की आकांक्षा- प्रत्येक मनुष्य को निरंतर सक्रिय रहने की प्रेरणा देती आयी है। मज़ेदार बात यह है कि आदिकाल से अब तक मनुष्य कभी भी सुविधाजनक स्थिति में नहीं रहा लेकिन संतोष की बात यह है कि वह कभी निराश भी नहीं हुआ। नए विकल्पों की तलाश और उत्सुकता से परिपूर्ण मस्तिष्क उसे हरदम नवोन्मेषी दृष्टिकोण अपनाने का अवसर देता रहा, हर पल आशा का संचार करता रहा और उसके विश्वास को मज़बूत सहारा देता रहा।

हम सब के सामने एक अबूझ प्रश्न है- 'आखिर जीवन इतना कठिन क्यों है?'

हमारी परिस्थिति और सोच हमारी प्रगति में सहयोग करती हैं, वहीं पर कई बार ये ही बाधाएँ बनकर भी सामने आ जाती हैं। छोटी-मोटी असफलताओं से हमारा विश्वास डगमगाने लगता है जो कई बार हमें यह सोचने के लिए विवश करता है- 'क्या सफलता का सुख मुझसे यूं ही दूर रहेगा?'

कठिन यात्रा-पथ में हमारी हृदय की आशा हमें संघर्ष करने और धीरज बनाए रखने का उत्साह देती रहती है। यह प्रक्रिया हमारे मन-मस्तिष्क से जुड़ी हुई है, चिंतन-मनन हमारे निर्णयों को आकार देता है। घटनाओं और व्यक्तियों के बारे में निकाले गये निष्कर्ष हमें अपनी अपने जीवन की रणनीति तैयार करने, उसे बदलने या उसे कायम रखने के संकेत देते है। इन्ही बातों से प्रभावित होकर हमारी कार्यशैली विकसित होती है।

हमारे मस्तिष्क की विलक्षण शक्तियाँ हैं। हमारे सोचने-विचारने का तरीका और निर्णय लेने की क्षमता हमारा भविष्य तय करती है। मनोवैज्ञानिक राबर्ट कैंपवेल का मत है- 'यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में अत्यंत निराशाजनक स्थिति में जी रहा हो तब भी वह अपने दिमाग की सहायता से विलक्षण सुधार ला सकता है। यहाँ तक कि शांति से जीवन व्यतीत कर सकता है और इसके ठीक विपरीत घनघोर मुसीबतों का शिकार भी हो सकता है।'

मन-मस्तिष्क की यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है, सवाल यह है कि जैसा हम चाहते हैं, वैसे परिणाम क्यों नहीं आते? जीवन भर प्रयत्न करने के बाद मनचाही सफलता क्यों नहीं मिलती? सबके लिए करने के बाद भी अपयश क्यों मिलता है? अपने कार्यों के परिणाम से संतुष्टि क्यों नहीं होती? ऐसा क्यों लगता है कि जीवन यूं ही बीत रहा है?

हम सब जानते हैं कि आत्मविश्वास सफलता प्राप्ति का सबसे प्रभावी अस्त्र है परंतु कई मौके पर वह भी साथ नहीं देता। किसी भी नये काम की शुरुआत में अनिष्ट और असफलता का विचार हावी होने लगता है। इसी कारण हम एक कदम आगे बढ़ते हैं और तीन कदम पीछे हट जाते हैं। सारा परिश्रम और समय निरर्थक व्यतीत हो जाता है। उसके बाद बचता है, निराशा का अंधकार, असफलता के दंश सहता मन और उपेक्षा की दृष्टि से हमें देखते हमारे-अपने लोग! आखिर हमसे कहाँ भूल हो जाती है?

इन्ही प्रश्नों के उत्तर हम यहाँ ढूँढने का प्रयत्न करेंगे।

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