समाज शास्त्री अब्राहम मास्लो का निष्कर्ष है - 'यदि मनुष्य को कुछ किए बिना खाने को मिल जाए तो वह अपने बिस्तर से नहीं उठेगा।'
वह 'भूख' है जो मनुष्य को काम करने के लिए मज़बूर करती है। इसका एक निहितार्थ यह भी है कि मनुष्य परम आलसी जीव है ! किसी भी उम्र का मनुष्य हो, वह काम करने से बचना चाहता है, काम न करने के बहाने खोजता है। योग के कार्यक्रम को देखकर स्वस्थ होना चाहता है लेकिन योग करना नहीं चाहता। 'खाना ख़जाना' के कार्यक्रम को मन लगाकर देखनेवालों की कमी नहीं लेकिन किचन में उन डिशों को बनाकर खाने-खिलाने वाले बिरले होते हैं। सुबह जागने का संकल्प करनेवाले अलार्म बजने पर अलार्म के आविष्कारक को को मन ही मन गरियाते हैं और उसे 'ऑफ' करके और अच्छे से सो जाते हैं। इस प्रकार के अनेक उदाहरण हमारे आसपास बिखरे हुए हैं जो हमारे आलस्य का गुणगान करते पाए जाते हैं। अब, स्वभाव से जन्मजात आलसी इस व्यक्ति को काम से लगाना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है।
वह 'भूख' है जो मनुष्य को काम करने के लिए मज़बूर करती है। इसका एक निहितार्थ यह भी है कि मनुष्य परम आलसी जीव है ! किसी भी उम्र का मनुष्य हो, वह काम करने से बचना चाहता है, काम न करने के बहाने खोजता है। योग के कार्यक्रम को देखकर स्वस्थ होना चाहता है लेकिन योग करना नहीं चाहता। 'खाना ख़जाना' के कार्यक्रम को मन लगाकर देखनेवालों की कमी नहीं लेकिन किचन में उन डिशों को बनाकर खाने-खिलाने वाले बिरले होते हैं। सुबह जागने का संकल्प करनेवाले अलार्म बजने पर अलार्म के आविष्कारक को को मन ही मन गरियाते हैं और उसे 'ऑफ' करके और अच्छे से सो जाते हैं। इस प्रकार के अनेक उदाहरण हमारे आसपास बिखरे हुए हैं जो हमारे आलस्य का गुणगान करते पाए जाते हैं। अब, स्वभाव से जन्मजात आलसी इस व्यक्ति को काम से लगाना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है।
जैसे, सरकारी सेवा में पदानुक्रम होते हैं। इस क्रम में सबके ऊपर कोई न कोई होता है। हर व्यक्ति स्वयं को 'बॉस' समझता है लेकिन बॉस कोई नहीं होता, हर कोई अधीनस्थ होता है। हर कोई अपने अधीनस्थ को धमकाकर या उसे चमकाकर काम लेता है क्योंकि हमारे बाप-दादों के जमाने से यही परिपाटी चली आ रही है, हमने वही सीखा है। यह सामंतवादी उपाय सुधारवादी प्रयोग की देन है जिसका असर सरकार में है, समाज में है, व्यापार में है और परिवार में भी है। बीसवी सदी के आरंभ में अनेक समाजशास्त्रियों ने मानव मन की गहराई में जाकर यह समझने की कोशिश की कि इस आलसी जीव से कैसे काम लिया जाए ?
समस्या यह है कि आलसी व्यक्ति को सक्रिय कैसे किया जाए!
आलस्य की शुरुआत मनुष्य के बचपन से होती है। ये प्रारम्भिक वर्ष बड़े मज़े के होते हैं। आराम से पड़े हैं, दिन में बीस-बीस घंटे सो रहे हैं, भूख लगी रो रहे हैं। माँ दौड़कर आएगी और दूध पिलाएगी। हगने-मूतने के लिए भी कहीं उठकर नहीं जाना है, सब बिस्तर पर हो रहा है और बिना किसी स्व-प्रयास के साफ हो रहा है। बदन की मालिश हो रही है, नहलाया जा रहा है, कपड़े बदले जा रहे हैं, सजाया-संवारा जा रहा है। कितना अच्छा हो कि मनुष्य का पूरा जीवन ऐसी ही सुख-सुविधा में बीते! लेकिन जैसे ही उम्र बढ़ती है, परिवार में बच्चे को आत्मनिर्भर बनने का प्रशिक्षण दिया जाता है। उम्मीद की जाती है कि दस वर्ष का होते-होते वह अपने काम खुद करने लगे। आत्मनिर्भर बनाने का यह दौर उसके भावी व्यवहार के लिए निर्णायक होता है। इस शिक्षण अवधि में यदि उसने सक्रियता का पाठ पढ़ लिया तो वह आजीवन सक्रिय रहेगा और अगर इसे न सीख पाया तो पूरा जीवन अजगर की तरह गहरी सांस लेगा और उम्मीद करेगा कि उसका भोजन उसके पास उड़ कर उसके पास चला आए।
दो आलसी एक बेर के पेड़ के नीचे लेटे थे। पेड़ में बेर के फल लटक रहे थे। एक ने दूसरे से कहा- 'कितना अच्छा हो कि बेर टपक का गिर जाए तो हम लेटे-लेटे खा लें।'
दूसरे ने उसे डपटते हुए कहा- 'चुप, बेर इधर-उधर गिर जाएगी तो उसे उठाने के लिए उठना पड़ेगा, कितना अच्छा हो कि बेर सीधे मुंह में आकर गिरे।'
बचपन में मनुष्य को कुछ समझ नहीं आता। माता-पिता और शिक्षक की नाव में बैठकर उस उम्र को बिताना होता है। वे नाव को जिस दिशा में ले जाए या जो कहें, वह सही मानना होता है। किशोरावस्था में ही हमें अपनी समझ और बुद्धि को परिमार्जित करना अत्यंत आवश्यक है। आप इस बात से सहमत होंगे कि इस कालखंड में मनुष्य के समक्ष अनेक चुनौतियाँ रहती हैं, जैसे, वह अच्छा छात्र बनना चाहता है लेकिन उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता, उत्कृष्ट खिलाड़ी बनना चाहता है लेकिन खेल के मैदान में सांस फूलती है, घर के काम में दक्ष होने की अभिलाषा है लेकिन वह कष्टसाध्य है, आदि। अपनी ऐसी मनोदशा में किशोर बहाने बनाना आरंभ कर देता है और परिश्रम से बचने के ये प्रयत्न उसे आलसी स्वभाव का बना देते है। काम से बच निकलने की यह यात्रा आजीवन चलती है, कोई काम करने को कहे तो बुरा लगता है, परिणामस्वरूप मनुष्य के विकास की गति धीमी पड़ जाती है।
मनुष्य की कार्यशैली के तीन रूप होते हैं, सक्रिय, अर्धसक्रिय और असक्रिय। सक्रिय वे लोग है जो परिश्रम को पूजा मानते हैं और ज़िम्मेदारी की गंभीरता को समझते हैं। ऐसे लोगों को आप आराम से बैठे या ऊँघते या आँखें बंद करके पसरे हुए नहीं पाएंगे। इन्हें काम दिखता है, सूझता है और जब तक काम पूरा न हो, इन्हें चैन नहीं पड़ता। सक्रियता का यह गुण आपको भारत उपमहाद्वीप की गृहणियों में बहुतायत से मिलेगा। गृहणियाँ घर के काम को जिस सूझ-बूझ और परिश्रम से संपादित करती हैं, वह किसी बड़ी कंपनी के प्रबंध-संचालक के काम से कम नहीं होता। उनका किचन प्रबंधन की पाठशाला है, उनका घर सुप्रबंधन का विश्वविद्यालय है। घर व्यवस्थित रखने का उनका बुद्धि-कौशल और भोजन बनाने से लेकर चौका समेटने तक का उनका परिश्रम उनकी बौद्धिक और शारीरिक सक्रियता का जीता-जागता उदाहरण है।
अर्धसक्रिय वे होते हैं जो हर समय सक्रिय नहीं होते बल्कि अपने 'मूड' से संचालित होते हैं। इनमें से अस्थिर स्वभाव के लोग कुछ खास अवसरों पर, या किसी खास व्यक्ति को देखकर या किसी को अपनी सक्रियता दिखाने के लिए सक्रिय होते हैं। इस श्रेणी के प्राणी कठिन कार्यों से खुद को दूर रखते हैं और 'यह काम मुझसे नहीं होगा' कहकर काम को दूसरों की तरफ खिसकाने के विशेषज्ञ होते हैं। वहीं पर स्थिर स्वभाव के लोग परिस्थिति की गंभीरता और महत्व को देखते हुए सक्रिय होते हैं लेकिन उस कार्य को पूरा करने के बाद चुपचाप बैठ जाते हैं। ऐसे लोग किसी के आग्रह करने पर प्रेरित होकर काम करते हैं लेकिन 'लग कर' काम करना इनके स्वभाव में नहीं होता। कई बार सक्रिय लोग दूसरों को काम न करता देखकर नाराजगी में अपनी सक्रियता कम कर देते हैं और अर्धसक्रिय हो जाते हैं।
तीसरी जमात है, असक्रिय लोगों की। यह धरती इन्हीं का बोझ उठाते हुए त्रस्त है। ये शारीरिक रूप से शिथिल लेकिन मानसिक रूप से प्रबल होते हैं। ये हर काम करना चाहते हैं, योग्य भी हैं लेकिन इनसे काम नहीं होता। बातें करने, बातें बनाने और दूसरे के किये कार्य पर मीनमेख निकालने में प्रवीण होते हैं। काम करने वाले की हंसी उड़ाना, ताने मारना और हतोत्साहित करना इनका प्रिय कार्य होता है क्योंकि इस उपाय के माध्यम से इनका काम न करना छुप जाता है। असक्रिय लोग अपनी असक्रियता को किसी संक्रामक रोग की तरह फैलाते हैं और अनेक सक्रिय लोग इनके प्रभाव में सहज ही आ जाते हैं। हमारे देश की आज़ादी के बाद की धीमी प्रगति में भ्रष्टाचार का जितना योगदान है, उतना ही इन आलसियों का भी है।
जो काम कर सकता है लेकिन नहीं करता, वह समाज पर बोझ नहीं तो और क्या है?
आम तौर पर सरकारी नौकरी मज़े के नौकरी मानी जाती है। नौकरी पक्की हो जाए तो काम करना या न करना- शासकीय सेवक की मर्जी से जुड़ा हुआ है। 'कंफर्म' होने के पहले और उसके बाद के काम करने की गुणवत्ता में पर्याप्त अंतर देखा जाता है। इससे यह निष्कर्ष भी निकाला जा सकता है कि काम करने का संबंध डर से है जिसमें नौकरी छिन जाने का डर सबसे बड़ा है। ऐसे अनेक उदाहरण देखने में आते हैं जहां ऐसे महानुभावों से काम लेने के लिए डांट-डपट, धमकी और अपशब्दों का सहारा लेना पड़ता है। यह विचारणीय है कि संगठन में इस तरह का माहौल क्या उचित है? क्यों लोग काम करने से विमुख हो जाते हैं, उनका उत्साह भंग हो जाता है ? क्या पढ़े-लिखे लोकतान्त्रिक समाज में 'चमकाइटिस' के अस्त्र का प्रहार न्यायोचित है? क्या संगठन में इस तरह का माहौल उचित है? क्यों लोग काम करने से विमुख हो जाते हैं, उनका उत्साह क्यों भंग हो जाता है?
दबाव के अधीन या डर के वशीभूत किए गए कार्य अपेक्षित परिणाम नहीं देते जबकि सरकारी, अर्धसरकारी या निजी संगठनों में कामगार को उत्साहित करने की जगह उनसे डरा-धमका कर कार्य लिया जाता है इसलिए काम की गुणवत्ता कमजोर होती है। यह विधा हमें अपने परिवार से उत्तराधिकार में मिली है जो हमारे साथ चल रही है। आधुनिक युग सामने वाले को बढ़ावा देकर, उत्साहित कर और चुनौती देकर काम करवाने का है। दादागिरी के दिन गए लेकिन हम अभी भी आदिमयुगीन प्रबंधन शैली को गले लगाए घूम रहे हैं।
उत्साह भंग होने की मुख्य वजह है, उत्साह की अस्थिरता। किसी काम को अपना काम समझकर करेंगे तो आपका उत्साह बना रहेगा लेकिन जैसे ही काम बोझ बना, उसे करने में रुचि खुद-ब-खुद कम होने लगेगी और उत्साह भी कम हो जायेगा।
सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने कहा है- 'अपने जीवन के हर पल आप जो भी करें, वह स्वेच्छा से करें, अनिच्छा से नहीं क्योंकि जिस पल अनिच्छा आती है, उस पल अगर कोई बहुत खूबसूरत चीज भी आपके साथ घटित हो रही होगी, तो वह भी आपको ऐसी लगेगी जैसे जिंदगी आपको परेशान कर रही है। अगर आप इच्छुक हैं तो बड़ी ही अच्छी बात है।'
किसी समूह में यदि लोग काम ठीक से नहीं कर रहे हैं, या काम करने से बचते हैं तो इसका एक ही कारण है- कार्य संस्कृति का विकसित न होना। प्रबंधन-गुरु शरू रांगड़ेकर ने कार्य संस्कृति का वर्गीकरण इस प्रकार किया है :
#आराम जीवन-मूल्य : आराम पसंद लोग प्रत्येक समूह में पाए जाते हैं। इनका जीवन-मंत्र है- 'आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों; जल्दी जल्दी क्यों करता है, अभी जीना है बरसों।' ये लोग काम न करने या उसे टालने या किसी दूसरे पर काम थोपने के विशेषज्ञ होते हैं। लच्छेदार बातें करना, बातें बनाना और बहाना करना- इनका अदृश्य गुण होता है। ये लोग कार्यालय का काम भले न करें लेकिन 'साहब का काम' करने में विशेष दक्ष होते हैं। कई साहब तो इनकी प्रतिभा से इस कदर प्रभावित रहते हैं कि इनकी राय लेकर 'स्टाफ मेनेजमेंट' करते हैं ! ऐसे लोग सरकारी-गैर सरकारी कार्यालयों में, उद्योग-व्यापार में, खेत-खलिहान में, घर-परिवार में- अर्थात यत्र-तत्र-सर्वत्र मिल जाएंगे। ये अपनी निष्क्रियता को छुपाने के लिए सक्रिय होने का ढोंग करने, काम करने वाले व्यक्ति का उपहास करने और एक-दूसरे को लड़ाने-भिड़ाने की कला में प्रवीण होते हैं।
#अर्थ जीवन-मूल्य : इस श्रेणी के लोग अर्ध-सक्रिय मानसिकता के होते हैं जो अपनी सेवाएँ यथोचित मूल्य प्राप्त होने पर ही देते हैं। डाक्टर, वकील, सी॰ए॰, आर्किटेक्ट, कंसल्टेंट जैसे 'प्रोफेशनल्स' अपनी काबिलियत को निःशुल्क नहीं देते बल्कि मनचाही कीमत वसूल करते हैं। सरकारी-अर्ध सरकारी संस्थानों में इस स्वभाव के कर्मचारी अपने वेतन के अतिरिक्त वसूली करते हैं जिसे बोलचाल की भाषा में रिश्वत कहा जाता है।
#कार्य जीवन-मूल्य : 'काम ही पूजा है' के सिद्धान्त को मानने वाले लोग ही इस दुनिया को संचालित कर रहे हैं। इन्हें काम करने में मज़ा आता है और जब तक सौंपे गए काम को ये पूरा नहीं कर लेते- इन्हें चैन नहीं आता। सिर्फ अपना ही नहीं, अपने सहयोगियों का काम भी अपने सिर पर ले लेने से इन्हें कोई परेशानी नहीं होती। अतिरिक्त पैसा, प्रमोशन आदि प्रलोभनों का इनके काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ये कार्यस्थल की ऐसी रक्तवाहिनी धमनियाँ हैं जो बिना शोर किए अपना कर्तव्य पूरा करती हैं।
#आराम जीवन-मूल्य : आराम पसंद लोग प्रत्येक समूह में पाए जाते हैं। इनका जीवन-मंत्र है- 'आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों; जल्दी जल्दी क्यों करता है, अभी जीना है बरसों।' ये लोग काम न करने या उसे टालने या किसी दूसरे पर काम थोपने के विशेषज्ञ होते हैं। लच्छेदार बातें करना, बातें बनाना और बहाना करना- इनका अदृश्य गुण होता है। ये लोग कार्यालय का काम भले न करें लेकिन 'साहब का काम' करने में विशेष दक्ष होते हैं। कई साहब तो इनकी प्रतिभा से इस कदर प्रभावित रहते हैं कि इनकी राय लेकर 'स्टाफ मेनेजमेंट' करते हैं ! ऐसे लोग सरकारी-गैर सरकारी कार्यालयों में, उद्योग-व्यापार में, खेत-खलिहान में, घर-परिवार में- अर्थात यत्र-तत्र-सर्वत्र मिल जाएंगे। ये अपनी निष्क्रियता को छुपाने के लिए सक्रिय होने का ढोंग करने, काम करने वाले व्यक्ति का उपहास करने और एक-दूसरे को लड़ाने-भिड़ाने की कला में प्रवीण होते हैं।
#अर्थ जीवन-मूल्य : इस श्रेणी के लोग अर्ध-सक्रिय मानसिकता के होते हैं जो अपनी सेवाएँ यथोचित मूल्य प्राप्त होने पर ही देते हैं। डाक्टर, वकील, सी॰ए॰, आर्किटेक्ट, कंसल्टेंट जैसे 'प्रोफेशनल्स' अपनी काबिलियत को निःशुल्क नहीं देते बल्कि मनचाही कीमत वसूल करते हैं। सरकारी-अर्ध सरकारी संस्थानों में इस स्वभाव के कर्मचारी अपने वेतन के अतिरिक्त वसूली करते हैं जिसे बोलचाल की भाषा में रिश्वत कहा जाता है।
#कार्य जीवन-मूल्य : 'काम ही पूजा है' के सिद्धान्त को मानने वाले लोग ही इस दुनिया को संचालित कर रहे हैं। इन्हें काम करने में मज़ा आता है और जब तक सौंपे गए काम को ये पूरा नहीं कर लेते- इन्हें चैन नहीं आता। सिर्फ अपना ही नहीं, अपने सहयोगियों का काम भी अपने सिर पर ले लेने से इन्हें कोई परेशानी नहीं होती। अतिरिक्त पैसा, प्रमोशन आदि प्रलोभनों का इनके काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ये कार्यस्थल की ऐसी रक्तवाहिनी धमनियाँ हैं जो बिना शोर किए अपना कर्तव्य पूरा करती हैं।
यह रोचक तथ्य है कि आराम जीवन-मूल्य वाले महानुभावों का असर कार्य जीवन-मूल्य वालों पर तेजी से होता है लेकिन इसका उल्टा बहुत कम होता है। काम करने वाला मनुष्य भिड़कर काम करता है, हर समय खटते रहता है और अपने अधिकारी से भरपूर डांट भी खाता है। यह दुनिया का रिवाज है कि डांट उसे पड़ती है जो गलती करता है, गलती वह करता है जो काम करता है ! इसलिए काम करने वाले का उत्साह धीरे-धीरे कम होते जाता है और वह आराम जीवन-मूल्य को अपनाने लगता है, परिणाम स्वरूप पूरा कार्यस्थल 'आफिस-आफिस' बन जाता है।
'गुड गवर्नेंस' के लिए कार्यस्थल का कार्यनुकूल वातावरण बहुत मायने रखता है। आराम-जीवनमूल्य और अर्थ-जीवनमूल्य वाले लोगों को कार्य-जीवनमूल्य की भावना से जोड़ना ही प्रशासक, प्रबन्धक या गृहस्वामी का कार्य होता है। आरामपसंद लोगों को काम से लगाना चुनौतीपूर्ण और कठिन है लेकिन जो लोग स्वयं कर्तव्यनिष्ठ होते हैं, वे अपने आसपास के माहौल को इस तरह 'चार्ज' कर देते हैं कि काम न करने वाले को अपराधबोध होने लगता है, फलस्वरूप वह खुद में बदलाव लाता है और सक्रिय हो जाता है। परिश्रमी और ईमानदार प्रबन्धक सबको अपने ढंग से संचालित करने का माद्दा रखते हैं।
अधिकतर कार्यस्थलों में यथास्थिति बनाए रखने के प्रयास होते हैं जिसके फलस्वरूप कार्यशैली में परिवर्तन दिखाई नहीं पड़ता और स्थिति दिनों-दिन बिगड़ती जाती है। 'साहब' यदि साहब है तो वह चाहे जितना चीखे-चिल्लाए, कोई खास परिवर्तन नहीं होता। वह सामने से हटा और उसका असर घटा। 'चेम्बर' में अपनी आराम कुर्सी में बैठा अधिकारी अपने अधीनस्थों को प्रेरित करने में सफल नहीं हो सकता. उसे अपने अधीनस्थों को काम समझाने और काम लेने के लिए बाहर निकलकर उनके साथ भिड़ना होगा, तब बात बनेगी। कुशल नेतृत्वकर्ता संगठन में अपनी कर्मठता से स्थायी प्रभाव पैदा करते हैं। वे सामने हों, या न हों, उनका 'सिस्टम' काम करता है।
काम करने की रुचि कम होने का एक बड़ा कारण यह है कि रोज-रोज एक जैसा काम करते हुए ऊब होने लगती है। एक बार मुझे बंबई (उस समय मुंबई नहीं था) के कफ परेड पर स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की 18वी मंजिल में प्रशिक्षण हेतु जाना था। साथ में मेरी पत्नी माधुरी भी थी। अंदर प्रवेश करते ही हमें सामने दो 'लिफ्ट' दिखी। एक लिफ्ट का दरवाजा खुला था जिसमें लोग घुस रहे थे, हम दोनों उधर लपके लेकिन 'ओवर लोड' की समस्या के कारण अंदर नहीं घुस पाए इसलिए दूसरी लिफ्ट की ओर पहुंचे। लिफ्टमेन लिफ्ट के बाहर एक स्टूल पर बैठा हुआ था, उसकी लिफ्ट का दरवाजा बंद था। मैंने उससे पूछा- 'लिफ्ट बंद है क्या?'
'चालू है।' उसने ठंडा जवाब दिया।
'ले चलो।'
'उस लिफ्ट में चले जाइए।'
'आप क्यों नहीं ले जा रहे हैं, आपकी तबीयत ठीक नहीं है या लिफ्ट की?'
'दोनों ठीक हैं, वो देखिए, लिफ्ट आ गई।' उसने हमें सुझाव दिया लेकिन मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी और कहा- 'कोई बात नहीं, हम लोग थोड़ी देर बाद चले जाएंगे, आप ये बताओ कि आज आप सुस्त क्यों दिख रहे हैं?'
'सुबह से लेकर रात तक एक ही काम है साहब, ऊपर जाओ, नीचे आओ।'
'वही तो तुम्हारी ड्यूटी है।'
'ड्यूटी है लेकिन ऊब हो जाती है।'
'यह काम पसंद नहीं तो कोई दूसरा काम ढूँढना चाहिए।'
'दूसरी नौकरी कहाँ मिलेगी?'
'तो इस काम को मज़े से करना चाहिए।'
'आप केवल बात कर रहे हो साहब, आपके ऊपर पड़ेगा तो समझ में आएगा।'
'मैं जो काम करता हूँ, मुझे भी रोज-रोज वही करना पड़ता है।' मैंने उसे बताया। मेरी बातों से वह खिन्न हो रहा था लेकिन लिफ्ट खोलने के लिए तैयार नहीं हुआ। इतने में दूसरी लिफ्ट फिर वापस आ गई। माधुरी जी ने मुझसे कहा- 'चलो न, उस लिफ्ट से चलते है, देर हो रही है। तुम क्यों अपना सिर खफा रहे हो?' वह लिफ्टमेन अपनी स्टूल पर बैठा ही रहा, नहीं हिला तो नहीं हिला।
खैर, हम लोग सक्रिय लिफ्ट में प्रविष्ट हो गए लेकिन मेरे दिमाग में एक और घटना तैर गई। मेरे बिलासपुरिया मित्र भूपेन्द्र जोबनपुत्रा के विवाह में मैं बाराती बनकर कलकत्ता (उस समय कोलकाता नहीं था) गया था। कार्यक्रम का आयोजन भवानीपुर में लक्ष्मीनारायण मंदिर के विवाह भवन में था। उस समय सुबह का नौ बजा रहा होगा, मैं अन्य बरातियों के साथ समारोह स्थल में पहुंचा। वैवाहिक कार्यक्रम तीसरी मंजिल में था। ऊपर जाने के लिए एक लिफ्ट थी जिसमें एक पाँच-फुटिया लिफ्टमेन जिसने सफ़ेद रंग का 'यूनिफ़ार्म' पहना हुआ था, सफ़ेद टोपी पहनी थी, माथे में लाल तिलक लगा हुआ था, ने दोनों हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए हमें 'जय राम जी' कहा और ऊपर ले जाकर छोड़ा। सुबह का नास्ता हुआ, उसके बाद अनुष्ठान हुआ, फिर दिन का भोज हुआ, धीरे-धीरे शाम होने को आई। इस बीच मैं तीन बार उस लिफ्ट से ऊपर-नीचे हुआ, वही लिफ्टमेन, वही मुस्कुराहट, वही 'जय राम जी'। उनके माथे पर शिकन नहीं, थकान का कोई चिन्ह नहीं।
उनके काम की लगन ने मुझे समझाया कि काम कोई भी हो, छोटा नहीं होता और न ही उबाऊ। जो भी काम हाथ में आए उसे दिल लगा कर करो, खुश होकर करो। जो व्यक्ति स्वप्रेरित होता है वह काम को रुचिकर बनाने के नए-नए उपाय खोजता है और अपना कार्य करने में आनंद का अनुभव करता है। दूसरों को प्रेरित करने से पूर्व स्वयं को प्रेरित करना अति आवश्यक है अन्यथा आपके द्वारा प्रभावित करने के प्रयास निष्फल हो सकते हैं। परिश्रमी व्यक्ति ही दूसरों के लिए प्रेरणाश्रोत बन सकता है। काम करने का माहौल सबको काम से लगाता है, यही अभिप्रेरणा का मूलमंत्र है।
किसी का शरीर आलसी नहीं होता, शरीर में कार्य करने की अपार क्षमता होती है। दरअसल शरीर मन के निर्देश पर सक्रिय होता है। जिस व्यक्ति का अपने मन पर नियंत्रण है वही अपने तन को नियंत्रित कर सकता है। इसके लिए मन को स्थिर करना पड़ता है, मन को स्थिर करने के लिए मन को साधना पड़ता है, यह एक अभ्यास है जिसे सीखा जा सकता है और अपनाया जा सकता है। संसार में सुनियोजित परिश्रम और सम्पूर्ण ईमानदारी का कोई विकल्प नहीं है। जिसने यह सूत्र समझ लिया, समझ लीजिए, वह सार्थक जीवन जीने की राह पर है।
काम करने की रुचि कम होने का एक बड़ा कारण यह है कि रोज-रोज एक जैसा काम करते हुए ऊब होने लगती है। एक बार मुझे बंबई (उस समय मुंबई नहीं था) के कफ परेड पर स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की 18वी मंजिल में प्रशिक्षण हेतु जाना था। साथ में मेरी पत्नी माधुरी भी थी। अंदर प्रवेश करते ही हमें सामने दो 'लिफ्ट' दिखी। एक लिफ्ट का दरवाजा खुला था जिसमें लोग घुस रहे थे, हम दोनों उधर लपके लेकिन 'ओवर लोड' की समस्या के कारण अंदर नहीं घुस पाए इसलिए दूसरी लिफ्ट की ओर पहुंचे। लिफ्टमेन लिफ्ट के बाहर एक स्टूल पर बैठा हुआ था, उसकी लिफ्ट का दरवाजा बंद था। मैंने उससे पूछा- 'लिफ्ट बंद है क्या?'
'चालू है।' उसने ठंडा जवाब दिया।
'ले चलो।'
'उस लिफ्ट में चले जाइए।'
'आप क्यों नहीं ले जा रहे हैं, आपकी तबीयत ठीक नहीं है या लिफ्ट की?'
'दोनों ठीक हैं, वो देखिए, लिफ्ट आ गई।' उसने हमें सुझाव दिया लेकिन मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी और कहा- 'कोई बात नहीं, हम लोग थोड़ी देर बाद चले जाएंगे, आप ये बताओ कि आज आप सुस्त क्यों दिख रहे हैं?'
'सुबह से लेकर रात तक एक ही काम है साहब, ऊपर जाओ, नीचे आओ।'
'वही तो तुम्हारी ड्यूटी है।'
'ड्यूटी है लेकिन ऊब हो जाती है।'
'यह काम पसंद नहीं तो कोई दूसरा काम ढूँढना चाहिए।'
'दूसरी नौकरी कहाँ मिलेगी?'
'तो इस काम को मज़े से करना चाहिए।'
'आप केवल बात कर रहे हो साहब, आपके ऊपर पड़ेगा तो समझ में आएगा।'
'मैं जो काम करता हूँ, मुझे भी रोज-रोज वही करना पड़ता है।' मैंने उसे बताया। मेरी बातों से वह खिन्न हो रहा था लेकिन लिफ्ट खोलने के लिए तैयार नहीं हुआ। इतने में दूसरी लिफ्ट फिर वापस आ गई। माधुरी जी ने मुझसे कहा- 'चलो न, उस लिफ्ट से चलते है, देर हो रही है। तुम क्यों अपना सिर खफा रहे हो?' वह लिफ्टमेन अपनी स्टूल पर बैठा ही रहा, नहीं हिला तो नहीं हिला।
खैर, हम लोग सक्रिय लिफ्ट में प्रविष्ट हो गए लेकिन मेरे दिमाग में एक और घटना तैर गई। मेरे बिलासपुरिया मित्र भूपेन्द्र जोबनपुत्रा के विवाह में मैं बाराती बनकर कलकत्ता (उस समय कोलकाता नहीं था) गया था। कार्यक्रम का आयोजन भवानीपुर में लक्ष्मीनारायण मंदिर के विवाह भवन में था। उस समय सुबह का नौ बजा रहा होगा, मैं अन्य बरातियों के साथ समारोह स्थल में पहुंचा। वैवाहिक कार्यक्रम तीसरी मंजिल में था। ऊपर जाने के लिए एक लिफ्ट थी जिसमें एक पाँच-फुटिया लिफ्टमेन जिसने सफ़ेद रंग का 'यूनिफ़ार्म' पहना हुआ था, सफ़ेद टोपी पहनी थी, माथे में लाल तिलक लगा हुआ था, ने दोनों हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए हमें 'जय राम जी' कहा और ऊपर ले जाकर छोड़ा। सुबह का नास्ता हुआ, उसके बाद अनुष्ठान हुआ, फिर दिन का भोज हुआ, धीरे-धीरे शाम होने को आई। इस बीच मैं तीन बार उस लिफ्ट से ऊपर-नीचे हुआ, वही लिफ्टमेन, वही मुस्कुराहट, वही 'जय राम जी'। उनके माथे पर शिकन नहीं, थकान का कोई चिन्ह नहीं।
उनके काम की लगन ने मुझे समझाया कि काम कोई भी हो, छोटा नहीं होता और न ही उबाऊ। जो भी काम हाथ में आए उसे दिल लगा कर करो, खुश होकर करो। जो व्यक्ति स्वप्रेरित होता है वह काम को रुचिकर बनाने के नए-नए उपाय खोजता है और अपना कार्य करने में आनंद का अनुभव करता है। दूसरों को प्रेरित करने से पूर्व स्वयं को प्रेरित करना अति आवश्यक है अन्यथा आपके द्वारा प्रभावित करने के प्रयास निष्फल हो सकते हैं। परिश्रमी व्यक्ति ही दूसरों के लिए प्रेरणाश्रोत बन सकता है। काम करने का माहौल सबको काम से लगाता है, यही अभिप्रेरणा का मूलमंत्र है।
किसी का शरीर आलसी नहीं होता, शरीर में कार्य करने की अपार क्षमता होती है। दरअसल शरीर मन के निर्देश पर सक्रिय होता है। जिस व्यक्ति का अपने मन पर नियंत्रण है वही अपने तन को नियंत्रित कर सकता है। इसके लिए मन को स्थिर करना पड़ता है, मन को स्थिर करने के लिए मन को साधना पड़ता है, यह एक अभ्यास है जिसे सीखा जा सकता है और अपनाया जा सकता है। संसार में सुनियोजित परिश्रम और सम्पूर्ण ईमानदारी का कोई विकल्प नहीं है। जिसने यह सूत्र समझ लिया, समझ लीजिए, वह सार्थक जीवन जीने की राह पर है।
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