आकाश में जड़े सितारों को पाने की ललक किसमें नहीं?
जन्म से मृत्यु तक की यात्रा में मनुष्य के समक्ष चुनौतियों के अंबार लगे रहते हैं। हममें से ज़्यादातर लोग अपनी पूरी ज़िंदगी पेट और पेट के नीचे की आग बुझाने में ही बिता देते हैं। वैसे, ये ज़रूरी भी है क्योंकि ये हमारी भौतिक आवश्यकताएँ हैं। सृष्टि के अन्य जीवधारी भी जीवन रक्षा के लिए प्रयास करके ज़िन्दा रहते हैं और अपनी वंशवृद्धि करते हैं लेकिन उनके और हमारे बुद्धिस्तर में अंतर है। बुद्धि हमें सोच प्रदान करती है और हमारा दृष्टिकोण विकसित करती है। संभवतः इसीलिए मनुष्य अपनी क्षुद्र आवश्यकताओं से ऊपर उठकर ऐसे कार्य करता है जो उसे अन्य जीवधारियों की तुलना में श्रेष्ठ बनाता है। अलग हटकर कुछ करने की ललक ने मनुष्य जाति को सभ्य होने का गौरव दिलाया है। इस सृष्टि के इतिहास की यह अद्भुत उपलब्धि है।
जन्म के बाद माँ के स्पर्श का आल्हाद, शैशवकाल में किसी की गोद में सवार होने का आनंद, बाल्यावस्था में सबके साथ शामिल होने की चाह, किशोरावस्था में कुछ कर दिखाने का जुनून, युवावस्था में संघर्ष करने की अदम्य इच्छाशक्ति और जीवन के उत्तरार्द्ध में शिखर तक पहुँचने की आकांक्षा- प्रत्येक मनुष्य को निरंतर सक्रिय रहने की प्रेरणा देती आयी है। मज़ेदार बात यह है कि आदिकाल से अब तक मनुष्य कभी भी सुविधाजनक स्थिति में नहीं रहा लेकिन संतोष की बात यह है कि वह कभी निराश भी नहीं हुआ। नए विकल्पों की तलाश और उत्सुकता से परिपूर्ण मस्तिष्क उसे हरदम नवोन्मेषी दृष्टिकोण अपनाने का अवसर देता रहा, हर पल आशा का संचार करता रहा और उसके विश्वास को मज़बूत सहारा देता रहा।
हम सब के सामने एक अबूझ प्रश्न है- 'आखिर जीवन इतना कठिन क्यों है?'
हमारी परिस्थिति और सोच हमारी प्रगति में सहयोग करती हैं, वहीं पर कई बार ये ही बाधाएँ बनकर भी सामने आ जाती हैं। छोटी-मोटी असफलताओं से हमारा विश्वास डगमगाने लगता है जो कई बार हमें यह सोचने के लिए विवश करता है- 'क्या सफलता का सुख मुझसे यूं ही दूर रहेगा?'
कठिन यात्रा-पथ में हमारी हृदय की आशा हमें संघर्ष करने और धीरज बनाए रखने का उत्साह देती रहती है। यह प्रक्रिया हमारे मन-मस्तिष्क से जुड़ी हुई है, चिंतन-मनन हमारे निर्णयों को आकार देता है। घटनाओं और व्यक्तियों के बारे में निकाले गये निष्कर्ष हमें अपनी अपने जीवन की रणनीति तैयार करने, उसे बदलने या उसे कायम रखने के संकेत देते है। इन्ही बातों से प्रभावित होकर हमारी कार्यशैली विकसित होती है।
हमारे मस्तिष्क की विलक्षण शक्तियाँ हैं। हमारे सोचने-विचारने का तरीका और निर्णय लेने की क्षमता हमारा भविष्य तय करती है। मनोवैज्ञानिक राबर्ट कैंपवेल का मत है- 'यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में अत्यंत निराशाजनक स्थिति में जी रहा हो तब भी वह अपने दिमाग की सहायता से विलक्षण सुधार ला सकता है। यहाँ तक कि शांति से जीवन व्यतीत कर सकता है और इसके ठीक विपरीत घनघोर मुसीबतों का शिकार भी हो सकता है।'
मन-मस्तिष्क की यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है, सवाल यह है कि जैसा हम चाहते हैं, वैसे परिणाम क्यों नहीं आते? जीवन भर प्रयत्न करने के बाद मनचाही सफलता क्यों नहीं मिलती? सबके लिए करने के बाद भी अपयश क्यों मिलता है? अपने कार्यों के परिणाम से संतुष्टि क्यों नहीं होती? ऐसा क्यों लगता है कि जीवन यूं ही बीत रहा है?
हम सब जानते हैं कि आत्मविश्वास सफलता प्राप्ति का सबसे प्रभावी अस्त्र है परंतु कई मौके पर वह भी साथ नहीं देता। किसी भी नये काम की शुरुआत में अनिष्ट और असफलता का विचार हावी होने लगता है। इसी कारण हम एक कदम आगे बढ़ते हैं और तीन कदम पीछे हट जाते हैं। सारा परिश्रम और समय निरर्थक व्यतीत हो जाता है। उसके बाद बचता है, निराशा का अंधकार, असफलता के दंश सहता मन और उपेक्षा की दृष्टि से हमें देखते हमारे-अपने लोग! आखिर हमसे कहाँ भूल हो जाती है?
इन्ही प्रश्नों के उत्तर हम यहाँ ढूँढने का प्रयत्न करेंगे।
* * * * * * * * * *
जन्म से मृत्यु तक की यात्रा में मनुष्य के समक्ष चुनौतियों के अंबार लगे रहते हैं। हममें से ज़्यादातर लोग अपनी पूरी ज़िंदगी पेट और पेट के नीचे की आग बुझाने में ही बिता देते हैं। वैसे, ये ज़रूरी भी है क्योंकि ये हमारी भौतिक आवश्यकताएँ हैं। सृष्टि के अन्य जीवधारी भी जीवन रक्षा के लिए प्रयास करके ज़िन्दा रहते हैं और अपनी वंशवृद्धि करते हैं लेकिन उनके और हमारे बुद्धिस्तर में अंतर है। बुद्धि हमें सोच प्रदान करती है और हमारा दृष्टिकोण विकसित करती है। संभवतः इसीलिए मनुष्य अपनी क्षुद्र आवश्यकताओं से ऊपर उठकर ऐसे कार्य करता है जो उसे अन्य जीवधारियों की तुलना में श्रेष्ठ बनाता है। अलग हटकर कुछ करने की ललक ने मनुष्य जाति को सभ्य होने का गौरव दिलाया है। इस सृष्टि के इतिहास की यह अद्भुत उपलब्धि है।
जन्म के बाद माँ के स्पर्श का आल्हाद, शैशवकाल में किसी की गोद में सवार होने का आनंद, बाल्यावस्था में सबके साथ शामिल होने की चाह, किशोरावस्था में कुछ कर दिखाने का जुनून, युवावस्था में संघर्ष करने की अदम्य इच्छाशक्ति और जीवन के उत्तरार्द्ध में शिखर तक पहुँचने की आकांक्षा- प्रत्येक मनुष्य को निरंतर सक्रिय रहने की प्रेरणा देती आयी है। मज़ेदार बात यह है कि आदिकाल से अब तक मनुष्य कभी भी सुविधाजनक स्थिति में नहीं रहा लेकिन संतोष की बात यह है कि वह कभी निराश भी नहीं हुआ। नए विकल्पों की तलाश और उत्सुकता से परिपूर्ण मस्तिष्क उसे हरदम नवोन्मेषी दृष्टिकोण अपनाने का अवसर देता रहा, हर पल आशा का संचार करता रहा और उसके विश्वास को मज़बूत सहारा देता रहा।
हम सब के सामने एक अबूझ प्रश्न है- 'आखिर जीवन इतना कठिन क्यों है?'
हमारी परिस्थिति और सोच हमारी प्रगति में सहयोग करती हैं, वहीं पर कई बार ये ही बाधाएँ बनकर भी सामने आ जाती हैं। छोटी-मोटी असफलताओं से हमारा विश्वास डगमगाने लगता है जो कई बार हमें यह सोचने के लिए विवश करता है- 'क्या सफलता का सुख मुझसे यूं ही दूर रहेगा?'
कठिन यात्रा-पथ में हमारी हृदय की आशा हमें संघर्ष करने और धीरज बनाए रखने का उत्साह देती रहती है। यह प्रक्रिया हमारे मन-मस्तिष्क से जुड़ी हुई है, चिंतन-मनन हमारे निर्णयों को आकार देता है। घटनाओं और व्यक्तियों के बारे में निकाले गये निष्कर्ष हमें अपनी अपने जीवन की रणनीति तैयार करने, उसे बदलने या उसे कायम रखने के संकेत देते है। इन्ही बातों से प्रभावित होकर हमारी कार्यशैली विकसित होती है।
हमारे मस्तिष्क की विलक्षण शक्तियाँ हैं। हमारे सोचने-विचारने का तरीका और निर्णय लेने की क्षमता हमारा भविष्य तय करती है। मनोवैज्ञानिक राबर्ट कैंपवेल का मत है- 'यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में अत्यंत निराशाजनक स्थिति में जी रहा हो तब भी वह अपने दिमाग की सहायता से विलक्षण सुधार ला सकता है। यहाँ तक कि शांति से जीवन व्यतीत कर सकता है और इसके ठीक विपरीत घनघोर मुसीबतों का शिकार भी हो सकता है।'
मन-मस्तिष्क की यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है, सवाल यह है कि जैसा हम चाहते हैं, वैसे परिणाम क्यों नहीं आते? जीवन भर प्रयत्न करने के बाद मनचाही सफलता क्यों नहीं मिलती? सबके लिए करने के बाद भी अपयश क्यों मिलता है? अपने कार्यों के परिणाम से संतुष्टि क्यों नहीं होती? ऐसा क्यों लगता है कि जीवन यूं ही बीत रहा है?
हम सब जानते हैं कि आत्मविश्वास सफलता प्राप्ति का सबसे प्रभावी अस्त्र है परंतु कई मौके पर वह भी साथ नहीं देता। किसी भी नये काम की शुरुआत में अनिष्ट और असफलता का विचार हावी होने लगता है। इसी कारण हम एक कदम आगे बढ़ते हैं और तीन कदम पीछे हट जाते हैं। सारा परिश्रम और समय निरर्थक व्यतीत हो जाता है। उसके बाद बचता है, निराशा का अंधकार, असफलता के दंश सहता मन और उपेक्षा की दृष्टि से हमें देखते हमारे-अपने लोग! आखिर हमसे कहाँ भूल हो जाती है?
इन्ही प्रश्नों के उत्तर हम यहाँ ढूँढने का प्रयत्न करेंगे।
* * * * * * * * * *
इस प्रेरक पहल के लिए साधुवाद -!!
ReplyDeleteआभार।
ReplyDeleteप्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः
ReplyDeleteप्रारभ्य विघ्नविहिता विरमन्ति मध्या ||
विघ्ने पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमाना
प्रारभ्य तूत्त मजना न परित्यजन्ति ||
नीच कोटि के मनुष्य विघ्नो से भय से कार्य आरम्भ ही नहीं करते है .मध्यम श्रेणी के मनुष्य कार्य आरम्भ करते तो हैं परन्तु विघ्न पड़ने पर कार्य छोड़ देते है .परन्तु उत्तम प्रकृति वाले कार्य आरम्भ कर के उसे अपूर्ण नहीं छोड़ते ,चाहे कितने ही विघ्न पड़ते रहे ..
आदरणीय ....
आभार ।
ReplyDelete