आम के पेड़ में यदि आम का फल उगे तो कैसा आश्चर्य?
हमारा दिमाग लगातार सक्रिय रहता है। जीवन में हो रही घटनाएँ अपने अनुभव के रूप में हमारे स्मृतिकोष में दर्ज़ होते रहती हैं। इन्हीं स्मृतियों के आधार पर मनुष्य के 'स्व' की रचना होती है। 'स्व' याने किसी व्यक्ति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व। यह व्यक्तित्व उसकी सोच और समझ के आधार पर विकसित होते रहता है। हर नया अनुभव उसे कुछ-न-कुछ सिखाता है जो उसके मस्तिष्क में अंकित होते रहता है। जो धारणा आज उसे सही समझ में आती हैं लेकिन कालांतर में उसके विपरीत परिणाम आने पर गलत लगने लगती है। पुरानी धारणा थी कि जलने पर घाव में पानी नहीं डालना चाहिए लेकिन अब जलने पर घाव को शीतल जल में डुबाकर रखने की सलाह मिलती है। पुरानी धारणा के एकदम विपरीत! हमने इसे अपनाकर देखा, परिणाम देखे और मस्तिष्क में अंकित पुरानी सूचना को विलोपित कर दिया और नई सूचना अंकित कर ली। इस तरह हमारे दिमाग में काट-छांट और जोड़ना-घटाना चलते रहता है। यद्यपि सभी मनुष्यों के मस्तिष्क की बनावट एक जैसी है किन्तु सबका ज्ञानबोध अलग-अलग होता है। इसीलिए किसी एक घटना विशेष के कई अर्थ निकल जाते हैं। यह अंतर भिन्न दृष्टिकोणों की वज़ह से होता है।
मनुष्य का व्यक्तित्व तीन तलों में विभाजित रहता है :
1: जैसा वह स्वयं को समझता है॰
2: जैसा दूसरे उसे जानते हैं॰
3: जैसा वास्तव में वह है॰
* जैसा वह स्वयं को समझता है:
हम लगातार अपने बारे में अपनी धारणा बनाते रहते हैं। हमारे द्वारा लिए गए निर्णय, उनका क्रियान्वयन और उनसे प्राप्त परिणाम हमारे अनुभव भंडार को बढ़ाते हैं। उन परिणामों को कसौटी मानकर हम अपनी व्यवहार नीति में आवश्यक परिवर्तन करते रहते हैं, वही हमारी कार्यशैली बन जाती है। विभिन्न परिस्थितियों में अपनाई गई शैलियाँ हमारे व्यक्तित्व का अंग बन जाती हैं जैसे, यदि हमारा काम मुस्कुराने से बन जाता है तो खुशमिजाज़ी हमारा स्वभाव बन जाता है और लेकिन यदि ज़िद करने या रोने से हमारा काम बनता है तो हम स्वभाव से जिद्दी या चिड़चिड़े बन जाते हैं। अपने स्वभाव को मनुष्य अच्छी तरह से समझता और जानता है लेकिन कभी तो स्वीकार कर लेता है तो कभी इंकार कर देता है। आलसी व्यक्ति अपने आलस्य को स्वीकार नहीं करता लेकिन काम न करने का बहाना बताकर मन-ही-मन खुश होता है।
हम सब ऐसा समझते हैं कि हम सही हैं लेकिन लोग हमें नहीं समझते। हर इंसान खुद को सीधा या भला मानता है और उसको अपनी दुष्टता और कमियाँ समझ में नहीं आती। वह अपने बारे में अक्सर भ्रामक धारणाएँ बना कर जीता है परिणामस्वरूप वह स्वयं को ठीक से नहीं जान पाता। 'मैं कैसा हूँ'- इस प्रश्न का उत्तर सदा उलझा हुआ रहता है। साधारणतया हम वही करते हैं जिसे हम उचित समझते हैं। समाज की उचित-अनुचित की सूची अलग होती है और मनुष्य की अलग। मनुष्य का उचित-अनुचित उसका विवेक होता है। जिन गतिविधियों को समाज गलत मानता है उसे गलत सिद्ध करने के अनेक मजबूत तर्क अवमानना करने वाले के पास होते हैं। अवैध लेन-देन करने वाले सहजता से तर्क देते हैं- 'क्या करें? सिस्टम से बंधे हैं।'
हमारे विवेक के द्वारा निर्धारित 'उचित' कार्य हमें वे संकेत देते हैं जिनसे हम अपने बारे में राय कायम करते हैं।
*जैसा दूसरे उसे जानते हैं :
हमारी सभी गतिविधियों पर लोगों की नज़र रहती है। दूसरे लोग अपनी सोच के आधार पर हमारे विषय में राय बनाते हैं जिसे 'पब्लिक इमेज़' कहा जाता है। लोग हमारी दिखने वाली गतिविधियों के आधार पर हमारे बारे में राय बनाते हैं जो वास्तविकता से अलग होती है क्योंकि मनुष्य उन बातों को छुपा कर रखता है जो समाज में निंदनीय होती है। कई बार जिस व्यक्ति को लोग 'अच्छा इन्सान' मानते हैं यदि उसकी असलियत उनके सामने उजागर हो जाए तो वे चकित रह जाएंगे। इसी प्रकार अच्छे व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है या उसे गलत समझ लिया जाता है परिणामस्वरूप अपनी तमाम अच्छाइयों के बावजूद एक भला व्यक्ति खलनायक घोषित हो जाता है। हमारे सामाजिक ताने-बाने में बातचीत की मृदुता और सादगी का बहुत सम्मान है, कई लोग इन्हें अपना बाहरी आवरण बनाकर अपनी मनमोहक छबि बना लेते हैं लेकिन ऐसी छबि टिकाऊ नहीं होती।
एक सच्ची घटना बताता हूँ, पुरानी बात है। मेरे एक मित्र क्रांतिकुमार ओझा जिन्हें कुंडली का ज्ञान है, मैंने अपनी जन्म कुंडली दिखाई और उनसे अतीत और भविष्य के बारे में कुछ बताने का निवेदन किया। कुंडली का अध्ययन करने के बाद उन्होंने मुझसे कहा- 'मैं तुम्हें कई सालों से जानता हूँ, तुम्हें एक सीधे-सादे इन्सान के रूप में जानता हूँ। आम लोगों में भी तुम्हारी 'इमेज' ऐसी ही है लेकिन मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ, नाराज मत होना।'
'जी, निःसंकोच बताइए।'
'तुम्हारी कुंडली में स्पष्ट संकेत हैं कि तुम बदमाश टाइप के आदमी हो।'
'ओझा जी, यह बात अभी तक केवल मुझे मालूम थी, अब आपको भी मालूम हो गई है, किसी और को मत बताना।' मैंने उनसे हाथ जोड़कर निवेदन किया।
शायर निदा फ़ाजली ने लिखा है:
'हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना हो कई बार देखना॰'
*जैसा वास्तव में वह है :
दूसरे को जानना जितना कठिन है, उतना ही खुद को जानना भी है। बात-व्यवहार की ऊपरी सतह को देखकर किसी की गहराई का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। समुद्र में तैरती बर्फ की चट्टान को देखने से जो दिखाई पड़ता है, वह विशाल चट्टान का छोटा सा हिस्सा है। यदि ऊपरी हिस्से को ही उसका वास्तविक आकार समझ लिया जाए तो बड़ी भूल हो जाएगी। ऐसी ही भूल मनुष्य के व्यक्तित्व के साथ होती है। कोई भी इन्सान किसी दूसरे को शत-प्रतिशत नहीं जान सकता लेकिन आश्चर्य यह है कि हम भी स्वयं को पूरी तरह नहीं जानते! हमें भ्रम रहता है कि हम अपने बारे में सब जानते हैं लेकिन हम अपनी सभी शक्तियों और कमजोरियों से अपरिचित रहते हैं क्योंकि हमें अपने भीतर झांक कर देखने का अभ्यास नहीं है। स्वयं की अंतर्यात्रा बिरले ही करते हैं।
प्रत्येक मनुष्य शक्तियों और कमजोरियों का मिश्रण होता है। संसार में सभी एक जैसे नहीं होते क्योंकि प्रकृति ने सबको अलग-अलग बनाया है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इसे आनुवांशिक प्रभाव मानता है। कुछ लोग नैसर्गिक रूप से उत्कृष्ट होते हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि जो उत्कृष्ट नहीं हैं वे निकृष्ट हैं। यह सही है कि लता मंगेशकर नैसर्गिक गायिका हैं, उन जैसी मधुर और सधी हुई आवाज़ में गा सकना सबके वश की बात नहीं है, लेकिन हम कुमार गंधर्व को भी जानते हैं जो फेफड़े के रोग से अनेक वर्षों तक जूझने के बावजूद केवल 'एक फेफड़े वाले' उत्कृष्ट शास्त्रीय गायक बने। बिस्मिल्ला खाँ एक सामान्य शहनाईवादक थे लेकिन अपनी संगीत साधना से उन्होंने शहनाईवादन को शास्त्रीय स्वरूप दिया और स्वयं शिखर पर पहुंचे। यह सही है कि सब में एक जैसी योग्यता नहीं होती लेकिन अगर कोई ज़िद ठान लें तो खुद में अभूतपूर्व सुधार लाकर नए प्रतिमान स्थापित कर सकता है। निरंतर प्रयास का कोई दूसरा विकल्प नहीं होता।
किसी कार्य विशेष को सम्पन्न करने की क्षमता को योग्यता कहा जाता है। योग्यता के मूल्यांकन से यह पता चलता है कि कोई व्यक्ति क्या कर सकता है और क्या नहीं। मानसिक गतिविधियों को संचालित करने के लिए बौद्धिक योग्यता चाहिए जबकि शरीर के माध्यम से किए जाने वाले कार्यों के लिए शारीरिक योग्यता आवश्यक होती है। इस बात को इस तरह समझने की कोशिश करते हैं:
बौद्धिक योग्यता :
* जो कुछ सुना या पढ़ा जाए उसके शब्दों के गूढ़ार्थ को समझने की क्षमता
* समस्या और उसके समाधान को तार्किक क्रमबद्धता से जानने की क्षमता
* तर्क का उपयोग तथा तर्क-वितर्क के परिणामों का मूल्यांकन करने की क्षमता
* स्मरण रखने की क्षमता
* गणितीय कार्य को तेजी और सटीकता से कर सकने की क्षमता
* उचित-अनुचित का भेद कर सकने की क्षमता
* समानताओं और असमानताओं को सटीक पहचानने की क्षमता
* किसी परिवर्तन की दशा में परिवर्तन के बाद कैसा होगा, यह कल्पना कर सकने की क्षमता
शारीरिक योग्यता :
* अपनी पेशियों की शक्ति से लगातार और बार-बार परिश्रम कर सकने की क्षमता
* किसी वस्तु को धकेलने या खींचने की क्षमता
* शरीर की पेशियों में लोच बनाकर रखने की क्षमता
* शरीर के उपयोग के समय सभी अंगों में तालमेल रख सकने की क्षमता
* शरीर को संतुलित रखने की क्षमता
* लंबे समय तक अधिकाधिक कार्य कर सकने की क्षमता
बौद्धिक और शारीरिक योग्यता के संतुलित उपयोग से मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। असंतुलन से व्यक्तित्व में दोष आने लगते हैं जैसे वुद्धि विकास पर अधिक ध्यान देने वाले लोग शारीरिक रूप से निष्क्रिय हो जाते हैं जिसका परिणाम होता है: कमजोरी, बीमारी, चिचिड़ाहट और उदासीनता। वहीं पर शारीरिक क्षमता बढ़ाने वालों का पढ़ाई में मन नहीं लगता और वे हर समय अपनी शक्ति के प्रदर्शन और उसके विसर्जन के मौके तलाशते रहते हैं। ये दोनों स्थितियाँ घातक हैं। दोनों क्षमताओं में संतुलित विकास करना, दोनों के लिए पर्याप्त समय निकालना और किसी भी अति से बचना श्रेयस्कर होगा।
यदि तन स्वस्थ नहीं है तो मन उदास रहेगा और यदि मन प्रसन्न नहीं है तो तन कैसे साथ देगा?
==========
हमारा दिमाग लगातार सक्रिय रहता है। जीवन में हो रही घटनाएँ अपने अनुभव के रूप में हमारे स्मृतिकोष में दर्ज़ होते रहती हैं। इन्हीं स्मृतियों के आधार पर मनुष्य के 'स्व' की रचना होती है। 'स्व' याने किसी व्यक्ति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व। यह व्यक्तित्व उसकी सोच और समझ के आधार पर विकसित होते रहता है। हर नया अनुभव उसे कुछ-न-कुछ सिखाता है जो उसके मस्तिष्क में अंकित होते रहता है। जो धारणा आज उसे सही समझ में आती हैं लेकिन कालांतर में उसके विपरीत परिणाम आने पर गलत लगने लगती है। पुरानी धारणा थी कि जलने पर घाव में पानी नहीं डालना चाहिए लेकिन अब जलने पर घाव को शीतल जल में डुबाकर रखने की सलाह मिलती है। पुरानी धारणा के एकदम विपरीत! हमने इसे अपनाकर देखा, परिणाम देखे और मस्तिष्क में अंकित पुरानी सूचना को विलोपित कर दिया और नई सूचना अंकित कर ली। इस तरह हमारे दिमाग में काट-छांट और जोड़ना-घटाना चलते रहता है। यद्यपि सभी मनुष्यों के मस्तिष्क की बनावट एक जैसी है किन्तु सबका ज्ञानबोध अलग-अलग होता है। इसीलिए किसी एक घटना विशेष के कई अर्थ निकल जाते हैं। यह अंतर भिन्न दृष्टिकोणों की वज़ह से होता है।
मनुष्य का व्यक्तित्व तीन तलों में विभाजित रहता है :
1: जैसा वह स्वयं को समझता है॰
2: जैसा दूसरे उसे जानते हैं॰
3: जैसा वास्तव में वह है॰
* जैसा वह स्वयं को समझता है:
हम लगातार अपने बारे में अपनी धारणा बनाते रहते हैं। हमारे द्वारा लिए गए निर्णय, उनका क्रियान्वयन और उनसे प्राप्त परिणाम हमारे अनुभव भंडार को बढ़ाते हैं। उन परिणामों को कसौटी मानकर हम अपनी व्यवहार नीति में आवश्यक परिवर्तन करते रहते हैं, वही हमारी कार्यशैली बन जाती है। विभिन्न परिस्थितियों में अपनाई गई शैलियाँ हमारे व्यक्तित्व का अंग बन जाती हैं जैसे, यदि हमारा काम मुस्कुराने से बन जाता है तो खुशमिजाज़ी हमारा स्वभाव बन जाता है और लेकिन यदि ज़िद करने या रोने से हमारा काम बनता है तो हम स्वभाव से जिद्दी या चिड़चिड़े बन जाते हैं। अपने स्वभाव को मनुष्य अच्छी तरह से समझता और जानता है लेकिन कभी तो स्वीकार कर लेता है तो कभी इंकार कर देता है। आलसी व्यक्ति अपने आलस्य को स्वीकार नहीं करता लेकिन काम न करने का बहाना बताकर मन-ही-मन खुश होता है।
हम सब ऐसा समझते हैं कि हम सही हैं लेकिन लोग हमें नहीं समझते। हर इंसान खुद को सीधा या भला मानता है और उसको अपनी दुष्टता और कमियाँ समझ में नहीं आती। वह अपने बारे में अक्सर भ्रामक धारणाएँ बना कर जीता है परिणामस्वरूप वह स्वयं को ठीक से नहीं जान पाता। 'मैं कैसा हूँ'- इस प्रश्न का उत्तर सदा उलझा हुआ रहता है। साधारणतया हम वही करते हैं जिसे हम उचित समझते हैं। समाज की उचित-अनुचित की सूची अलग होती है और मनुष्य की अलग। मनुष्य का उचित-अनुचित उसका विवेक होता है। जिन गतिविधियों को समाज गलत मानता है उसे गलत सिद्ध करने के अनेक मजबूत तर्क अवमानना करने वाले के पास होते हैं। अवैध लेन-देन करने वाले सहजता से तर्क देते हैं- 'क्या करें? सिस्टम से बंधे हैं।'
हमारे विवेक के द्वारा निर्धारित 'उचित' कार्य हमें वे संकेत देते हैं जिनसे हम अपने बारे में राय कायम करते हैं।
*जैसा दूसरे उसे जानते हैं :
हमारी सभी गतिविधियों पर लोगों की नज़र रहती है। दूसरे लोग अपनी सोच के आधार पर हमारे विषय में राय बनाते हैं जिसे 'पब्लिक इमेज़' कहा जाता है। लोग हमारी दिखने वाली गतिविधियों के आधार पर हमारे बारे में राय बनाते हैं जो वास्तविकता से अलग होती है क्योंकि मनुष्य उन बातों को छुपा कर रखता है जो समाज में निंदनीय होती है। कई बार जिस व्यक्ति को लोग 'अच्छा इन्सान' मानते हैं यदि उसकी असलियत उनके सामने उजागर हो जाए तो वे चकित रह जाएंगे। इसी प्रकार अच्छे व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है या उसे गलत समझ लिया जाता है परिणामस्वरूप अपनी तमाम अच्छाइयों के बावजूद एक भला व्यक्ति खलनायक घोषित हो जाता है। हमारे सामाजिक ताने-बाने में बातचीत की मृदुता और सादगी का बहुत सम्मान है, कई लोग इन्हें अपना बाहरी आवरण बनाकर अपनी मनमोहक छबि बना लेते हैं लेकिन ऐसी छबि टिकाऊ नहीं होती।
एक सच्ची घटना बताता हूँ, पुरानी बात है। मेरे एक मित्र क्रांतिकुमार ओझा जिन्हें कुंडली का ज्ञान है, मैंने अपनी जन्म कुंडली दिखाई और उनसे अतीत और भविष्य के बारे में कुछ बताने का निवेदन किया। कुंडली का अध्ययन करने के बाद उन्होंने मुझसे कहा- 'मैं तुम्हें कई सालों से जानता हूँ, तुम्हें एक सीधे-सादे इन्सान के रूप में जानता हूँ। आम लोगों में भी तुम्हारी 'इमेज' ऐसी ही है लेकिन मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ, नाराज मत होना।'
'जी, निःसंकोच बताइए।'
'तुम्हारी कुंडली में स्पष्ट संकेत हैं कि तुम बदमाश टाइप के आदमी हो।'
'ओझा जी, यह बात अभी तक केवल मुझे मालूम थी, अब आपको भी मालूम हो गई है, किसी और को मत बताना।' मैंने उनसे हाथ जोड़कर निवेदन किया।
शायर निदा फ़ाजली ने लिखा है:
'हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना हो कई बार देखना॰'
*जैसा वास्तव में वह है :
दूसरे को जानना जितना कठिन है, उतना ही खुद को जानना भी है। बात-व्यवहार की ऊपरी सतह को देखकर किसी की गहराई का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। समुद्र में तैरती बर्फ की चट्टान को देखने से जो दिखाई पड़ता है, वह विशाल चट्टान का छोटा सा हिस्सा है। यदि ऊपरी हिस्से को ही उसका वास्तविक आकार समझ लिया जाए तो बड़ी भूल हो जाएगी। ऐसी ही भूल मनुष्य के व्यक्तित्व के साथ होती है। कोई भी इन्सान किसी दूसरे को शत-प्रतिशत नहीं जान सकता लेकिन आश्चर्य यह है कि हम भी स्वयं को पूरी तरह नहीं जानते! हमें भ्रम रहता है कि हम अपने बारे में सब जानते हैं लेकिन हम अपनी सभी शक्तियों और कमजोरियों से अपरिचित रहते हैं क्योंकि हमें अपने भीतर झांक कर देखने का अभ्यास नहीं है। स्वयं की अंतर्यात्रा बिरले ही करते हैं।
प्रत्येक मनुष्य शक्तियों और कमजोरियों का मिश्रण होता है। संसार में सभी एक जैसे नहीं होते क्योंकि प्रकृति ने सबको अलग-अलग बनाया है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इसे आनुवांशिक प्रभाव मानता है। कुछ लोग नैसर्गिक रूप से उत्कृष्ट होते हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि जो उत्कृष्ट नहीं हैं वे निकृष्ट हैं। यह सही है कि लता मंगेशकर नैसर्गिक गायिका हैं, उन जैसी मधुर और सधी हुई आवाज़ में गा सकना सबके वश की बात नहीं है, लेकिन हम कुमार गंधर्व को भी जानते हैं जो फेफड़े के रोग से अनेक वर्षों तक जूझने के बावजूद केवल 'एक फेफड़े वाले' उत्कृष्ट शास्त्रीय गायक बने। बिस्मिल्ला खाँ एक सामान्य शहनाईवादक थे लेकिन अपनी संगीत साधना से उन्होंने शहनाईवादन को शास्त्रीय स्वरूप दिया और स्वयं शिखर पर पहुंचे। यह सही है कि सब में एक जैसी योग्यता नहीं होती लेकिन अगर कोई ज़िद ठान लें तो खुद में अभूतपूर्व सुधार लाकर नए प्रतिमान स्थापित कर सकता है। निरंतर प्रयास का कोई दूसरा विकल्प नहीं होता।
किसी कार्य विशेष को सम्पन्न करने की क्षमता को योग्यता कहा जाता है। योग्यता के मूल्यांकन से यह पता चलता है कि कोई व्यक्ति क्या कर सकता है और क्या नहीं। मानसिक गतिविधियों को संचालित करने के लिए बौद्धिक योग्यता चाहिए जबकि शरीर के माध्यम से किए जाने वाले कार्यों के लिए शारीरिक योग्यता आवश्यक होती है। इस बात को इस तरह समझने की कोशिश करते हैं:
बौद्धिक योग्यता :
* जो कुछ सुना या पढ़ा जाए उसके शब्दों के गूढ़ार्थ को समझने की क्षमता
* समस्या और उसके समाधान को तार्किक क्रमबद्धता से जानने की क्षमता
* तर्क का उपयोग तथा तर्क-वितर्क के परिणामों का मूल्यांकन करने की क्षमता
* स्मरण रखने की क्षमता
* गणितीय कार्य को तेजी और सटीकता से कर सकने की क्षमता
* उचित-अनुचित का भेद कर सकने की क्षमता
* समानताओं और असमानताओं को सटीक पहचानने की क्षमता
* किसी परिवर्तन की दशा में परिवर्तन के बाद कैसा होगा, यह कल्पना कर सकने की क्षमता
शारीरिक योग्यता :
* अपनी पेशियों की शक्ति से लगातार और बार-बार परिश्रम कर सकने की क्षमता
* किसी वस्तु को धकेलने या खींचने की क्षमता
* शरीर की पेशियों में लोच बनाकर रखने की क्षमता
* शरीर के उपयोग के समय सभी अंगों में तालमेल रख सकने की क्षमता
* शरीर को संतुलित रखने की क्षमता
* लंबे समय तक अधिकाधिक कार्य कर सकने की क्षमता
बौद्धिक और शारीरिक योग्यता के संतुलित उपयोग से मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। असंतुलन से व्यक्तित्व में दोष आने लगते हैं जैसे वुद्धि विकास पर अधिक ध्यान देने वाले लोग शारीरिक रूप से निष्क्रिय हो जाते हैं जिसका परिणाम होता है: कमजोरी, बीमारी, चिचिड़ाहट और उदासीनता। वहीं पर शारीरिक क्षमता बढ़ाने वालों का पढ़ाई में मन नहीं लगता और वे हर समय अपनी शक्ति के प्रदर्शन और उसके विसर्जन के मौके तलाशते रहते हैं। ये दोनों स्थितियाँ घातक हैं। दोनों क्षमताओं में संतुलित विकास करना, दोनों के लिए पर्याप्त समय निकालना और किसी भी अति से बचना श्रेयस्कर होगा।
यदि तन स्वस्थ नहीं है तो मन उदास रहेगा और यदि मन प्रसन्न नहीं है तो तन कैसे साथ देगा?
==========
खुद को सही में जानना शायद सबसे ज्यादा जरूरी है!
ReplyDeleteजी, खुद के अंदर की यात्रा महत्वपूर्ण होती है, जीवन को सार्थक दिशा देती है। आभार।
Delete